नागरिकता कानून के समर्थन में उतरे 1100 बुद्धिजीवी, मोदी सरकार को दिया धन्यवाद

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नई दिल्ली: नागरिकता कानून और एनआरसी पर जारी विरोध के बीच अब इसको लेकर समर्थन के भी स्वर सामने आने लगे हैं. देश के 1100 बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने नागरिकता कानून का समर्थन करते हुए एक बयान जारी किया है. निजी हैसियत से दिए गए बयान में कहा गया है कि नागरिकता कानून उस पुरानी मांग को पूरा करता है जो सालों से पाकिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक प्रताड़ना के चलते भारत आए शरणार्थियों द्वारा की जा रही थी. बयान में नेहरू लियाक़त समझौते को एक बड़ी नाकामी बताते हुए कहा गया है कि समझौते की असफलता के बाद कांग्रेस और लेफ्ट जैसी पार्टियां भी इन लोगों को नागरिकता देने की मांग करती रही हैं. इस क़ानून के लिए उन्होंने मोदी सरकार और भारत की संसद का धन्यवाद किया है.

संविधान सम्मत है कानून

इन बुद्धिजीवियों का दावा है कि कानून पूरी तरह संविधान सम्मत है. उनका कहना है कि क़ानून किसी भी देश के नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोकता, चाहे वो किसी भी धर्म को मानने वाले हों. उनके मुताबिक़ ये क़ानून केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने के बारे में है.

शांति की अपील

अपने बयान में इन बुद्धिजीवियों ने छात्रों और उन लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है जो इस क़ानून और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं. उन्होंने समाज के सभी वर्गों से ऐसी शक्तियों के बहकावे में नहीं आने की अपील की है जो, उनके मुताबिक़, समाज में जानबूझकर डर का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में दिल्ली विश्विद्यालय के प्रो. प्रकाश सिंह , जेएनयू के डॉ प्रमोद कुमार, प्रो. आएनुल हसन, प्रो. अश्विनी महापात्रा और प्रो. मज़हर आसिफ़, आईआईएम शिलांग के निदेशक शिशिर बिजौरिया और राज्यसभा सांसद और स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता शामिल हैं.

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