Panga Movie Review: सपनों को पूरा करने के लिए जिंदगी से लेना होगा ‘पंगा’, दमदार है कंगना की एक्टिंग

0
24

Panga Movie Review: अगर इंसान को अपने सपने पूरे करने हों तो उसे जिंदगी में काफी मेहनत करनी पड़ती है, वहीं अगर यही सपने किसी औरत ने देखे हों तो उसका स्ट्रगल और भी बढ़ जाता है. कंगना रनौत की फिल्म ‘पंगा’ एक ऐसी ही औरत की कहानी दिखाती है जिसने अपने परिवार के लिए अपने सपनों को छोड़ दिया. लेकिन बाद में उसी परिवार की खातिर वो अपने मरे हुए सपनों को फिर से जगाने की कोशिश में लग जाती है.

कहते हैं कि सफर मंजिल तक पहुंचे या न लेकिन सफर का शुरू होना सबसे अहम है… अश्विनि अय्यर तिवारी के निर्देशन में बनी ये फिल्म भी इसी सफर की कहानी दिखाती है. लीड रोल में कंगना रनौत नजर आ रही हैं और उनका साथ दे रहे हैं पंजाबी सिंगर और एक्टर जस्सी गिल. ये फिल्म एक मोटिवेशनल फिल्म है जो आपका दिल छू जाएगी. अगर आप भी इस वीकेंड अपनी फैमिली के साथ फिल्म देखने का मन बना रहे हैं तो पहले ये रिव्यू पढ़ें…

कहानी

ये कहानी है जया निगम (कंगना रनौत) की जो एक शानदार कबड्डी की प्लेयर है. जया ने भारत की कप्तानी भी की और खूब नाम भी कमाया. जया का कबड्डी करियर अपनी चरम पर था वो प्रशांत (जस्सी गिल) से शादी कर लेती हैं. ऐसा नहीं है कि प्रशांत ने जया को खेलने से रोका है, लेकिन टूर्नामेंट से पहले जया प्रेग्नेंट हो जाती हैं. प्रेग्नेंट जया अपने बच्चे को जन्म देने के बाद खेल में वापसी का फैसला लेती हैं. लेकिन वापसी की ये राह इतनी आसान नहीं थी. असल में जया के बेटे आदि का इम्यून सिस्टम काफी वीक होता है जिसके कारण उसकी ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. बेटे के लिए जया अपना सपना और करियर दोनों छोड़ देती है और रेलवे में नौकरी करने लगती है.

कहते हैं कि इंसान दुनिया से दूर भाग सकता है लेकिन अपने आप से नहीं. जया ने कबड्डी के लिए अपनी दीवानगी को काफी दबाने की कोशिश की लेकिन वो ऐसा कर नहीं पाईं. जया इस गिल्ट के साथ अपने अंदर ही घुटे जा रही है. जया का बेटा उनके अंदर की इस घुटन को समझता है और अपनी मम्मी को एक बार फिर वापसी करने के लिए मना लेता है. लेकिन 8 साल से खेलना छोड़ चुकीं जया के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्तरों पर आसान नहीं है. फिल्म की कहानी इसी सफर पर आधारित है.

निर्देशन

‘नील बटे सन्नाटा’ और ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में बना चुकीं अश्विनी अय्यर तिवारी का निर्देशन इस फिल्म में जरा कमजोर रहा है. खासतौर पर अगर फिल्म के फर्स्ट हाफ की बात करें तो वो काफी वीक रहा. फिल्म में कई जगह ऐसे मूमेंट आए जहां ये महसूस होता है कि सही मायनों आप फिल्म ही देख रहे हैं. दर्शक कहानी से कई बार भटकते हैं. हालांकि इसका सेकेंड हाफ बेहतर है. फिल्म को जबरन खींचने की कोशिश नहीं की गई है और कम समय में अपनी बात समझाने की कोशिश की गई है.


LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.