1942 जैसी लव स्टोरी ‘शिकारा’ से ताजा हुए 33 साल पुराने जख्म, मिला ‘भूलो और माफ करो’ का मैसेज

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बॉलीवुड डेस्क. शिकारा मूल रूप से चार लाख कश्मीरी पंडितों के पलायन की पृष्ठभूमि में उम्मीद और मोहब्बत की एक प्रेम कहानी है। यह पलायन के कारणों की गहन पड़ताल में कम जाती है। कसूरवारों से सीधे तौर पर सख्त सवाल नहीं करती है। यह उस डिबेट में नहीं जाती है कि अगर समाज और व्यवस्था की संरचना बहुसंख्यकों के हितों और उनकी मनमानियों से होने लगी तो उसके नतीजे इंसानियत को क्या भुगतने पड़ सकते हैं? जो 90 के दशक में कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ, वह तब वहां के बहुसंख्यक समाज के स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए हुई सियासत का नतीजा था। आज जो सीएए और एनआरसी को लेकर सियासत हो रही है, वह भी आज के बहुसंख्यक समाज के ‘हितों’ का हवाला देकर उस पर हो रही सियासत का अंजाम है।

शिकारा की कहानी और पंडितों का दर्द

  1. बहरहाल, फिल्म के लेखक और निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की बहस में नहीं गए हैं। उन्होंने दो कश्मीरी पंडितों की प्रेम कहानी के जरिए इस पूरे डिस्कोर्स पर एक संदेश देने और स्टैंड लेने की कोशिश की है। संदेश इस बात का कि इंसानियत इसी में है कि ‘भूलो और माफ करो।’ अतीत के जख्मों को संजोए रखने से आज और आने वाले कल दोनों में कड़वाहटें और टकराहटें ही रह जाएंगी। उन्होंने स्टैंड यह लेने की कोशिश की है कि आखिर कैसे एक पूरा सिस्टम 30 सालों तक लाखों लोगों को उनका हक कैसे नहीं दिला पाता है?
  2. फिल्म की कहानी 1987 से शुरू होती है। उस तब के कश्मीर में, जहां अमन चैन का वास है। वहां क्रिकेट भी है। फिल्मों की शूटिंग भी हैं। किसी को किसी का खौफ नहीं है। उस खूबसूरत वादी। में शांति और शिवकुमार धर की खूबसूरत प्रेम कहानी जन्म लेती हैं। जन्नत से भी बढ़कर अपने घर को लेकर वहां के युवकों में बेपनाह प्यार है। वहां उस वक्त नवीन जुत्सी जैसे युवा भी हैं, जो विदेशों में मोटी पगार की पेशकश को छोड़कर कश्मीर में रह रहे हैं। लतीफ लोन। जैसे युवक है। जिनकी दोस्ती कश्मीरी पंडितों के साथ एक मिसाल है। उसके वालिद ने शिवकुमार धर की पढ़ाई लिखाई का खर्चा उठाया है। लतीफ के हाथों में मजहबी नारे नहीं है। बल्कि क्रिकेट का बल्ला है और अपने राज्य का नाम क्रिकेट की दुनिया में रौशन करना है। सबकी जिंदगी खुशहाल है। शांति और शिव की शादी पर लतीफ और उसके वालिद की खुशी देखने लायक होती है। उनके नए घर की बुनियाद में भी दोनों बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
  3. एक साल बाद तूफान की दस्तक होती है। तब के सियासी और दूसरी वजहों से। कश्मीरी पंडितों के खिलाफ वहां का बहुसंख्यक समाज हो जाता है। पंडितों से जगह, जमीन छोड़ देने के नारे लगने लगते हैं। पंडितों को यह सब चंद नफरत फैलाने वाले लोगों की साजिश लगती है। वे यह नहीं। स्वीकार कर पाते हैं कि उनके खिलाफ संस्थागत तौर पर साजिश हुई है। फिर वह 19 जनवरी 1989 की रात आती है, जब पंडितों पर हमले होते हैं। नवीन जुत्सी मारा जाता है। शांति और शिव को अपना घर बार छोड़कर। जम्मू के रिफ्यूजी कैंप में जाना पड़ता है। तब से लेकर 2018 तक। वह अमरीकी राष्ट्रपति को सैकड़ों चिट्ठियां लिखता है कि कैसे अमेरिका के द्वारा अफगानिस्तान में दिए गए हथियारों की वजह से कश्मीर का यह हाल हुआ। अमेरिका और रूस के बीच उस वक्त तो शीत युद्ध हो गया लेकिन कश्मीर में शांति कभी बहाल नहीं हो सकी। शांति और शिव का सफर फिर उस रिफ्यूजी कैंप में इस उम्मीद पर आगे बढ़ता है कि वह कभी ना कभी अपने घर जरूर पहुंच पाएंगे।
  4. फिल्म की कहानी में विधु विनोद चोपड़ा को अभिजात जोशी और राहुल पंडिता का साथ मिला है। उन तीनों ने शांति और शिव के किरदार कभी कड़वाहट नहीं आने दी है। इसके बावजूद कि शिव का बचपन का दोस्त लतीफ भी उन लोगों के साथ है, जो कश्मीरी पंडितों के खिलाफ है। जिंदगी रिफ्यूजी कैंप में शांति और बाकी कश्मीरी पंडितों का इम्तिहान लेती रहती है लेकिन तीनों राइटर्स ने पंडितों को उम्मीद से भरा ही दिखाया है।
  5. फिल्म की कहानी इस नैरेटिव के साथ महसूस की जाए तो विधु विनोद चोपड़ा बहुत हद तक सफल साबित हुए हैं। उन्होंने 87 से पहले के कश्मीर की खूबसूरती को बखूबी दिखाया है और पंडितों के पलायन के बाद के उजड़े हुए कश्मीर को भी उन्होंने असरदार तरह से पेश किया है। उन्हें फिल्म के सभी कलाकारों का बखूबी साथ मिला है। शांति के रोल में सादिया, शिव बने आदिल खान, लतीफ के रोल में जैन खान दुर्रानी और नवीन जुत्सी की भूमिका में प्रियांशु चटर्जी ने बहुत अच्छा काम किया है। यहां तक कि शांति और शिव को बार-बार आगाह करने वाले दूध वाले रहमाना के रोल में फरीद आजाद खान भी जंचे हैं। 
  6. मेकअप, कॉस्टयूम और बैकग्राउंड स्कोर के मोर्चे पर फिल्म सधी हुई है। संदेश शांडिल्य और अभय सोपोरी ने इरशाद कामिल के साथ मिलकर असर छोड़ने वाला गीत-संगीत दिया है। स्क्रीन पर कश्मीर की खूबसूरती और वहां की वीरानी दोनों इंप्रेसिव हैं। यह जरूर है कि पलायन के मुद्दे पर प्रेम कहानी हावी है। इस तरह की फिल्में कैरेक्टर को बिल्ट अप करने के लिए वक्त मांगती हैं। इस लिहाज से फिल्म थोड़ी ज्यादा छोटी रह गई है।

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