जीबी रोड की महिलाएं सियासी सरगर्मियों से बेखबर; कहा- सरकार से सरोकार नहीं, हम जिंदगी में खुश हैं, बस धंधा चलता रहे

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नई दिल्ली. गारस्टिन बास्टिन रोड। मुमकिन है दिल्ली में ही लंबा वक्त गुजार चुके कई लोग आज भी इस नाम से वाकिफ न हों। पर, जैसे ही जीबी रोड कहेंगे, वो समझ जाएंगे कि आप किस इलाके की बात कर रहे हैं। अजमेरी गेट से लाहौरी गेट के बीच स्थित दो-ढाई किमी लंबे इस रोड का नाम 1965 में बदलकर श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया था। लेकिन सिर्फ नाम ही बदला, पहचान नहीं। और शायद नाम भी नहीं। यह दिल्ली का रेड लाइट एरिया है। छोटी-बड़ी और जर्जर सी इमारतें। ग्राउंड फ्लोर पर करीबन 90 फीसदी दुकानें ऑटो पार्ट्स की हैं। इन्हीं के ऊपर कुछ कोठे या कहें बेहद छोटे फ्लैट्स हैं। यहां कई दशकों से देह व्यापार किया जाता रहा है। दिल्ली में चुनाव है और यह इलाका मटिया महल विधानसभा क्षेत्र में आता है। हम इस इलाके में पहुंचे और जानना चाहा कि सेक्स वर्कर्स की नजरों में सियासत और सरकार के क्या मायने हैं। साथ ही इनकी अपेक्षाएं क्या हैं… क्या सरकारों ने इनकी बेहतरी के लिए कुछ किया है? ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशती यह रिपोर्ट…

कोठी नंबर: 64
जीबी रोड पर हम रिक्शे से उतरे तो फौरन एक शख्स करीब आया। बेझिझक अंदाज में पूछा- क्या ऊपर जाना है? जाहिर है ये उसका रोज का काम होगा। हमने उसे बताया- हम पत्रकार हैं। दिल्ली चुनाव और यहां के हालात पर रिपोर्ट तैयार करने आए हैं। उसने बेमन से कहा- कोठी नंबर 64 में जाओ, सब जानकारी मिल जाएगी। दरकती सीढ़ियां हमें वहां पहुंचाती हैं। एक महिला सामने आती है, जिसे हम अपना मकसद बताते हैं। यहां वीडियो बनाने की इजाजत किसी सूरत में नहीं मिलती, चेहरा छुपाकर भी नहीं। वजह? महिला कहती है- आवाज से गांव वाले पहचान लेंगे। हमने पूछा- बीते 5 साल में आपकी जिंदगी कितनी बदली। महिला ने कहा, ‘हमारी जिंदगी जैसी थी, वैसी ही है। सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया और हम उनसे कुछ चाहते भी नहीं। धंधा जैसा चलता है, बस वैसा ही चलता रहे।’ हालांकि यहां बातचीत के दरमियान ये जरूर महसूस हुआ कि ज्यादातर महिलाएं नरेंद्र मोदी के नाम से वाकिफ हैं, लेकिन केजरीवाल से नहीं।

अलग-अलग राज्यों की महिलाएं
इसी कोठी में ऊपर भी एक मंजिल है। यहां एक बुजुर्ग महिला मिलीं। उन्होंने कहा- ‘हम अलग-अलग राज्यों से आकर यहां बसे हैं। 22 साल गुजर गए यहां। हमारे बच्चे अपने-अपने गांव में पढ़ रहे हैं। किसी सरकार या सियासत से कोई लेना-देना नहीं। हम सभी के पास आधार कार्ड हैं। हालांकि, वोटर कार्ड कम महिलाओं के पास हैं। वहीं खड़ी एक कम उम्र की लड़की से हमने पूछा, ‘दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं, क्या आपको पता है?’ तो वह हंसते हुए बोली, ‘हमें कुछ नहीं पता। आप हमसे मत पूछो।‘ ये पूछने पर कि यहां दिल्ली की भी महिलाएं हैं? जवाब मिला, ‘जीबी रोड पर दिल्ली की कोई महिला नहीं है। ज्यादातर पश्चिम बंगाल और नेपाल की हैं। दिल्ली की महिलाएं प्राइवेट काम करती हैं। ये हम नहीं करते।’

कोठी नंबर : 65
चंद मीटर के फासले पर कोठी नंबर 65 है। यहां भी चुनाव और सियासत के प्रति कोई रुचि नहीं दिखी। एक महिला उखड़े और अनमने ढंग से बातचीत को तैयार हुईं। कहा- ‘किसी सरकारी योजना का कोई फायदा नहीं मिला। उल्टा ये हुआ कि नोटबंदी की वजह से ग्राहक कम हो गए। धंधा मंदा हो गया। वोट लेने तो सब आते हैं। काम करने कोई नहीं, लेकिन इसका भी गिला नहीं। बस पुलिस का झंझट नहीं चाहिए। बाकी हमारा तो सब ठीक चल रहा है।’

कोठी नंबर : 63
लगभग हर कोठी या कोठे के हालात एक जैसे हैं। दुश्वारियां और दर्द दिलों में जरूर होंगे, लेकिन जुबां तक पहुंचने का रास्ता जैसे अंतहीन है। हर कोठी के नीचे दलाल हैं। ये ग्राहकों को ऊपर लाते हैं। कोठी नंबर 63 की महिलाएं बातचीत से परहेज करती हैं। यहां बस इतना पता लगता है कि इन सभी के बच्चे बाहर पढ़ते हैं। सियासी मामलों पर ये चुप्पी साध लेती हैं।

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