सुप्रीम कोर्ट ने कहा- एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं, लेकिन मामला एक्ट के तहत नहीं पाया गया तो अग्रिम जमानत मिल सकेगी, केस भी रद्द हो सकेगा

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति का उत्पीड़न रोकने से जुड़े कानून (एससी/एसटी एक्ट) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने इसी के साथ साफ कर दिया है कि अगर मामला पहली नजर में एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं पाया गया तो आरोपी को अग्रिम जमानत मिल सकती है। एफआईआर रद्द भी हाे सकती है। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच और किसी आला पुलिस अफसर की मंजूरी जरूरी नहीं होगी।

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तार पर रोक लगाई थी। साथ ही आरोपियों को अग्रिम जमानत देने का प्रावधान किया था। इसके बाद सरकार ने कानून में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संशोधन बिल पास कराया था। जस्टिस अरुण मिश्र, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रवींद्र भट की बेंच ने सोमवार को इस मामले में 2-1 से फैसला दिया, यानी दो जज फैसले के पक्ष में थे और एक ने इससे अलग राय रखी।

एससी/एसटी एक्ट के मामले में 4 पड़ाव

1) 20 मार्च 2018 : सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने स्वत: संज्ञान लेकर एससी/एसटी एक्ट में आरोपियों की शिकायत के फौरन बाद गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। शिकायत मिलने पर एफआईआर से पहले शुरुआती जांच को जरूरी किया गया था। साथ ही अंतरिम जमानत का अधिकार दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था के चलते कई बार बेकसूर लोगों को जेल जाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- गिरफ्तारी से पहले शिकायतों की जांच निर्दोष लोगों का मौलिक अधिकार है।

2) 9 अगस्त 2018 : फैसले के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संसद में संशोधित बिल लेकर आई। इसके तहत एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं रह गई। जांच अफसर को गिरफ्तारी का अधिकार मिल गया और अग्रिम जमानत का प्रावधान हट गया।
3) 1 अक्टूबर 2019 : शीर्ष अदालत की 3 जजों की बेंच ने तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने के 2 जजों की बेंच के मार्च 2018 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा- एससी/एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी देश में छुआछूत और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। उनका अभी भी सामाजिक रूप से बहिष्कार किया जा रहा है। देश में समानता के लिए अभी भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है।

4) 10 फरवरी 2020 : जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने के पहले जांच जरूरी नहीं है। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं है। जस्टिस रविंद्र भट ने फैसले में कहा- हर नागरिक को दूसरे नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। अगर शुरुआती तौर पर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस नहीं बनता, तो अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है। ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का खुला इस्तेमाल संसद की मंशा के खिलाफ होगा।

कुछ बदलाव के साथ कानून मूलरूप में लागू रहेगा: वकील
याचिकाकर्ता प्रिया शर्मा ने कहा- मार्च 2018 में कोर्ट ने कहा था कि एफआईआर दर्ज करने से पहले अधिकारियों से मंजूरी लेनी होगी यानी उसके बाद ही एफआईआर दर्ज होगी। लेकिन, अब एफआईआर दर्ज करने के लिए इसकी जरूरत नहीं होगी, यानी एससी/एसटी एक्ट कुछ बदलाव के साथ अपने मूलरूप में लागू रहेगा। लेकिन, अगर अदालत को लगता है कि आरोपी के खिलाफ सबूत नहीं हैं, तो वह अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

देश में 17 फीसदी दलित वोट
एससी-एसटी कानून का मुद्दा इसलिए भी गरमाया था, क्योंकि देश में 17% दलित वोट हैं। इनका 150 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर असर है। अप्रैल 2018 में जिन 12 राज्यों में हिंसा हुई, वहां उस समय एससी/एसटी वर्ग से 80 लोकसभा सदस्य थे।

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