5 साल पहले भारत में हाथ ट्रांसप्लांट करवाने वाले सेना के मेजर रहीम नहीं रहे, आतंकियों ने कार को बम से उड़ाया

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नई दिल्ली. अफगान सेना में मेजर अब्दुल रहीम पिछले सप्ताह बम धमाके में मारे गए। रहीम वही शख्स हैं, जिन्हें 2015 में भारतीय हाथों ने नई जिंदगी दी थी। अब्दुल माइन डिफ्यूज करने वाली अफगानिस्तान की सैन्य यूनिट में थे। अप्रैल 2012 में बम डिफ्यूज करते वक्त उन्होंने दोनों हाथ गंवा दिए थे। 3 साल बाद भारत में उन्हें नए हाथ मिले। कोच्चि के अमृता इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में उनकी हैंड ट्रांसप्लांट सर्जरी हुई। 16 महीने तक वे भारत में ही रहे। ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक उनकी फिजियोथैरेपी चलती रही। नए हाथ मिलने के बाद वे फिर से अफगानिस्तान आर्मी में शामिल हुए, जहां हाल ही में उन्होंने प्रमोट कर मेजर बनाया गया था। वे राजधानी काबुल में पोस्टेड थे।

2000 से ज्यादा बम निष्क्रिय कर चुके थे
अब्दुल 35 साल के थे। उन्होंने करीब 2000 से ज्यादा बम डिफ्यूज किए। अप्रैल 2012 में जब वे कांधार इलाके में माइन्स डिफ्यूज ऑपरेशन में थे, तभी एक बम धमाके में उन्होंने दोनों हाथ खो दिए। भारत में हुए ऑपरेशन के बाद उनके हाथ पहले की तरह तो काम नहीं करते थे लेकिन, फिर भी उन्होंने दोबारा आर्मी में जाने का रास्ता चुना। पिछले सप्ताह आतंकियों ने उनकी कार में ही बम लगा दिया। इस बम धमाके में उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

भारत से जब अफगानिस्तान लौट रहे थे, तब रहीम आर्मी में जाने को लेकर उत्साहित थे 
मई 2016 में रहीम वापस अफगानिस्तान लौट रहे थे। इस वक्त तक वे अपने सभी काम खुद करने लगे थे। कार और साइकिल भी चला लेते थे। उन्हें कोई काम चुनौती नहीं लगता था। घर लौटने को लेकर वे बहुत उत्साहित भी थे। परिवार ने भी उनके आने पर जश्न रखा था। अफगान लौटने से पहले दैनिक भास्कर ने जब अब्दुल से बातचीत की तो उनका कहना था कि वे अब ठीक हैं और दोबारा सेना में जाना चाहते हैं। इसका कारण उन्होंने बताया था कि अफगानिस्तान में जो हालात हैं उसके चलते अभी अपने लोगों की सुरक्षा के लिए सेना की बहुत जरूरत है।

20 सर्जन और 8 एनेस्थिटिक्स की टीम को ऑपरेशन में 15 घंटे लगे थे 
रहीम को हाथ दान करने वाले शख्स कोच्चि के टीजी जोसेफ थे। 54 वर्षीय जोसेफ एक्सीडेंट के बाद ब्रेन डेड हो गए थे। जोसेफ के परिवार ने रहीम की मदद के लिए अंग दान करने के लिए हामी भरी थी। अब्दुल रहीम की हैंड ट्रांसप्लांट सर्जरी एक मैराथन ऑपरेशन था। करीब 15 घंटे तक 20 सर्जन और 8 एनेस्थिटिक्स की टीम इस ऑपरेशन में लगे रही। इसके बाद अगले 16 महीने तक फिजियोथैरेपी के जरिए उनके हाथों में मूवमेंट को आसान बनाया गया। हॉस्पिटल ने इस सर्जरी को दूसरा सफल हैंड ट्रांसप्लांट ऑपरेशन बताया था। पहला हैंड ट्रांसप्लांट ऑपरेशन भी कोच्चि के इसी हॉस्पिटल में 2015 में ही हुआ था।

भारत में अब्दुल की सबसे ज्यादा मदद करने वाले मनु ने भी अपने दोनों हाथ खो दिए थे
यहां भारत में अब्दुल की सबसे ज्यादा मदद मनु ने की। मनु अब्दुल को फिजियोथैरेपी करवाते थे। मनु के भी दोनों हाथ ट्रांसप्लांट हुए हैं। कुछ लोगों ने मनु को इसलिए ट्रेन से फेंक दिया था क्योंकि वो उन्हें सिगरेट पीने से रोक रहे थे। इस हादसे में मनु ने दोनों हाथ खो दिए। हाथ ट्रांसप्लांट होने के बाद वे कोच्चि के अस्पताल में ही बतौर ट्रांसप्लांट असिस्टेंट काम करने लगे। वे हाथों में चोट लगे मरीजों की फिजियोथैरेपी करवाते हैं।

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