अमित शाह ने संसद में दिल्ली पुलिस की तारीफ की, लेकिन 4 वीडियो में वही पुलिस दंगाइयों और हेट स्पीच देने वालों के साथ चुपचाप खड़ी दिखी थी

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नई दिल्ली. लोकसभा में बुधवार को दिल्ली हिंसा पर हुई चर्चा में गृहमंत्री अमित शाह ने पुलिस की तारीफ की। उन्होंने कहा, ‘‘मैं दिल्ली पुलिस की प्रशंसा भी करना चाहता हूं और शाबाशी भी देना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने इसे पूरी दिल्ली में फैलने नहीं दिया। दिल्ली के 4% क्षेत्र और 13% आबादी तक हिंसा को सीमित रखने का काम दिल्ली पुलिस ने किया है। दिल्ली पुलिस ने 36 घंटे के अंदर दंगे को समेटा है।’’ गृहमंत्री का यह बयान सदन में एकदम चौंकाने वाला था। चौंकाने वाला इसलिए क्योंकि 24-25 फरवरी को हुई हिंसा के दौरान पुलिस के ऐसे कई वीडियो सामने आए थे, जिसमें कभी वह दंगाइयों को पत्थरबाजी करते हुए देख रही थी, कभी खुद पत्थरबाजी कर रही थी तो कभी भाजपा नेता के भड़काऊ बयान को चुपचाप खड़े सुन रही थी।

भाजपा नेता कपिल मिश्रा के एक बयान को दंगे भड़काने की शुरुआत माना जाता रहा है। दिल्ली के मौजपुर में सीएए के समर्थन में वे सड़क पर उतरे थे। इस दौरान कपिल मिश्रा ने पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा था, ‘‘ट्रम्प के जाने तक अगर रास्ते खाली नहीं हुए तो हम आपकी भी नहीं सुनेंगे। जाफराबाद और चांद बाग की सड़कें खाली करवाइए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसके बाद हमें मत समझाइएगा। सिर्फ तीन दिन, इसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे।’’ कपिल मिश्रा जब ये बात कह रहे थे, तब उनके बगल में एक पुलिस अधिकारी चुपचाप खड़े होकर इस भड़काऊ बयान को सुन रहे थे।

यह वीडियो खजूरी खास, वजीराबाद मेन रोड का है। पीछे काला धुआं दिखाई दे रहा है और आगे सड़क पत्थरों से पटी पड़ी है। इस वीडियो में दंगाइयों के साथ पुलिस जवान भी पत्थरबाजी करते नजर आ रहे हैं।

इस वीडियो को ध्यान से देखें तो नजर आता है कि पुलिस के इशारे के बाद दंगाई पत्थर लेकर दौड़ लगा रहे हैं। दंगाइयों के साथ पुलिस के जवान भी डंडे लेकर दौड़ लगाते दिखते हैं।

इस वीडियो की शुरुआत में ही एक पुलिस जवान शांति से खड़ा दिखाई दे रहा है जबकि भीड़ पत्थर लेकर दौड़ती नजर आ रही है। आगे कई और पुलिस जवान दिख रहे हैं, लेकिन वे बस इस भीड़ को देख रहे हैं।

जामिया और जेएनयू हिंसा में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे थे
दिल्ली हिंसा से पहले भी दिल्ली पुलिस कुछ महीनों से लगातार चर्चा में रही है। दिसंबर में जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के बाहर सीएए के विरोध में निकल रहे मार्च के दौरान हिंसा भड़की थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस के जवान यूनिवर्सिटी के अंदर लाइब्रेरी में घुसकर डंडे बरसाते नजर आए थे। जनवरी में जेएनयू में हुई हिंसा में भी नकाबपोश हमलावरों को पुलिस 2 महीनों तक पकड़ नहीं पाई, जबकि इन्हें नकाब के बावजूद काफी हद तक पहचाना जा रहा था।

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