मध्य प्रदेश की राजनीति में अब सुप्रीम कोर्ट रेफरी की भूमिका में, इससे पहले भी 22 साल में 8 बड़े फैसलों से उठापटक पर लगाया है विराम

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पॉलिटिकल डेस्क. मध्य प्रदेश में जारी सियासत को विराम कब लगेगा? कमलनाथ सदन में कब बहुमत साबित करेंगे? यदि नहीं साबित कर पाए तो नई सरकार का गठन कब होगा? राज्य की सियासत का रेफरी कौन होगा? विधानसभा स्पीकर, राज्यपाल या फिर सुप्रीम कोर्ट? ये सवाल हर किसी के जेहन में है। भाजपा कमलनाथ सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इस पर सुनवाई है। ऐसे में मध्य प्रदेश के सियासी मैदान में सुप्रीम कोर्ट रेफरी की भूमिका में आ गया है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई राज्यों की राजनीति में रेफरी की भूमिका निभा चुका है।

महाराष्ट्र- नवंबर 2019: फडणवीस को फ्लोर टेस्ट के लिए 24 घंटे का समय मिला

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने 22 नवंबर को देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। फडणवीस सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 14 दिन का समय दिया। इस पर कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। कोर्ट ने फडणवीस को बहुमत सबित करने के लिए महज 24 घंटे का समय दिया। कोर्ट ने साफ किया कि मतदान गुप्त नहीं हो और फ्लोर टेस्ट का लाइव टेलिकास्ट किया जाए। फडणवीस ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

कर्नाटक- जुलाई 2019: कोर्ट ने कहा- स्पीकर जल्द से जल्द फ्लोर टेस्ट कराएं

कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार से कांग्रेस और जेडीएस के 15 विधायकों द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद विधानसभा स्पीकर फ्लोर टेस्ट में समय ले रहे थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने स्पीकर को जल्द से जल्द से फ्लोर टेस्ट कराने को कहा। कुमारस्वामी फ्लोर टेस्ट पास करने में नाकाम रहे।

कर्नाटक- जुलाई 2018: येद्दियुरप्पा को कोर्ट ने बहुमत साबित करने के लिए तीन दिन दिए

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस और जेडीएस ने चुनाव के बाद गठबंधन कर लिया। इससे पहले राज्यपाल ने भाजपा के बीएस येद्दियुरप्पा को शपथ दिलाई और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया। कांग्रेस और जेडीएस मामले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिन में फ्लोर टेस्ट कराने को कहा। येद्दियुरप्पा ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

गोवा, मार्च- 2017: सुप्रीम कोर्ट ने पर्रिकर सरकार के पक्ष में सुनाया फैसला

मार्च 2017 में कांग्रेस द्वारा बहुमत और सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने के बावजूद मनोहर पर्रिकर ने शपथ ले ली। पर्रिकर ने 21 विधायकों के समर्थन का दावा किया। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई। कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट की मांग खारिज कर दी। कहा- जब कोई पार्टी बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं होती है, तब इसका सहारा लिया जाता है।

अरुणाचल, जुलाई- 2016: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा दिया

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले को पलट दिया। इससे पहले अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक गतिरोध का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने 24 जनवरी 2016 को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। इसे कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

उत्तराखंड- मई 2016: हाईकोर्ट के फैसले पर पहले सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाया, फिर सरकार को बहाल किया

केंद्र सरकार ने राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया था। नैनीताल हाईकोर्ट ने हरीश रावत सरकार को बहाल करते हुए 29 अप्रैल को विश्वास मत हासिल करने का आदेश दे दिया था। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई, कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाा दी। इसके बाद उत्तराखंड विधानसभा में 10 मई 2016 को फ्लोर टेस्ट हुआ, इसमें हरीश रावत सरकार ने बहुमत हासिल कर लिया। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को हरीश रावत सरकार को बहाल कर दिया।

झारखंड, मार्च- 2005: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को पलट दिया

झारखंड में राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने एनडीए नेता अर्जुन मुंडा की जगह शिबू सोरेन को सीएम पद की शपथ दिला दी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया।आखिरकार शिबू सोरेन को इस्तीफा देना पड़ा। अर्जुन मुंडा नए सीएम बने।

1998, उत्तर प्रदेश: कोर्ट के आदेश पर जगदंबिका पाल की सरकार गिर गई

1998 में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने जगदंबिका पाल सरकार को बहुमत परीक्षण कराने का आदेश दिया। कल्याण सिंह ने 225 वोट हासिल किया, जबकि जगदंबिका पाल को 196 वोट मिले। इस तरह जगदंबिका पाल की एक दिन पुरानी सरकार विधानसभा में गिर गई।

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