भाजपा की फ्लोर टेस्ट की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस की दलील- स्पीकर सर्वोपरि, राज्यपाल उन पर हावी हो रहे

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नई दिल्ली. मध्य प्रदेश में जारी सियासी घमासान के बीच भाजपा की ओर से फ्लोर टेस्ट कराने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। कांग्रेस के वकील ने अदालत से कहा- बागी विधायकों के इस्तीफे भाजपा नेताओं ने स्पीकर को सौंपे थे, इसकी जांच बहुत जरूरी है। रात को मुख्यमंत्री और स्पीकर को फ्लोर टेस्ट का आदेश देना राज्यपाल का काम नहीं है। स्पीकर इस मामले में सर्वोपरि हैं, राज्यपाल उन पर हावी हो रहे हैं। कमलनाथ सरकार के बहुमत परीक्षण नहीं कराने के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और 9 भाजपा विधायकों ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर की है।

अदालत ने मंगलवार को सभी पक्षकारों राज्यपाल लालजी टंडन, मुख्यमंत्री कमलनाथ और विधानसभा स्पीकर एनपी प्रजापति को नोटिस देकर 24 घंटे में जवाब मांगा था। इसबीच, कांग्रेस ने भी एक अर्जी लगाई और बेंगलुरु में ठहरे 22 बागी विधायकों को वापस लाने का निर्देश देने की मांग की।

अपडेट्स

  • कांग्रेस विधायकों की पैरवी कर रहे वकील दुष्यंत दवे ने कहा- मध्य प्रदेश की जनता ने कांग्रेस पर भरोसा किया। चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस ने उसी दिन विश्वास मत हासिल कर लिया था। बहुमत के साथ 18 महीने सरकार चलाई। भाजपा बलपूर्वक सरकार को अस्थिर कर लोकतंत्र मूल्यों को खत्म करना चाहती है। उसने 16 विधायकों को अवैध हिरासत में रखा है। इस पर बागी विधायकों के वकील मनिंदर सिंह ने कहा- ये झूठ है, कोई हिरासत में नहीं है।
  • दवे ने कहा- विधायकों से जबरन इस्तीफे लिखवाए गए। होली के दिए भाजपा के नेताओं ने जाकर 19 बागी विधायकों के इस्तीफे स्पीकर को दिए थे। ये बड़ी साजिश है। इसकी जांच बहुत जरूरी है। बागी विधायकों को चार्टर्ड विमानों से बाहर ले जाया गया। उन्हें भाजपा नेताओं द्वारा बुक किए रिसॉर्ट में रखा गया है। स्पीकर इस मामले में सर्वोपरि हैं, राज्यपाल उन पर हावी हो रहे हैं। रात को मुख्यमंत्री और स्पीकर को फ्लोर टेस्ट का आदेश देना राज्यपाल का काम नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- दूसरे पक्ष को भी सुनेंगे

मंगलवार की सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार और कांग्रेस के पक्षकार मौजूद नहीं थे। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम दूसरे पक्ष को भी सुनेंगे। इसके बाद अदालत ने सभी पक्षकारों को ईमेल और वॉट्सऐप के जरिए नोटिस भेजे थे। इसके साथ ही ईमेल पर बागी विधायकों की अर्जी और याचिका की कॉपी भी पक्षकारों को भेजी गई। भाजपा की तरफ से पैरवी करने पहुंचे वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा था कि कांग्रेस के 22 विधायक पार्टी छोड़कर चले गए, उनके पास बहुमत नहीं है, इसलिए उनकी तरफ से कोई सुनवाई में नहीं आया।

ऐसे केस में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में क्या फैसला दिया?
भाजपा ने याचिका में 1994 के एसआर बोम्मई vs भारत सरकार, 2016 के अरुणाचल प्रदेश, 2019 के शिवसेना vs भारत सरकार जैसे मामलों का जिक्र किया है। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे में फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था। अरुणाचल प्रदेश के मामले में कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्यपाल को लगता है कि मुख्यमंत्री बहुमत खो चुके हैं तो वे फ्लोर टेस्ट का निर्देश देने के लिए स्वतंत्र हैं। 2017 में गोवा से जुड़े एक मामले में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक और टिप्पणी की- ‘फ्लोर टेस्ट से सारी शंकाएं दूर हो जाएंगी और इसका जो नतीजा आएगा, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी विश्वसनीयता मिल जाएगी।’

राज्यपाल ने दो बार फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था

भाजपा ने दावा किया है कि कमलनाथ सरकार बहुमत खो चुकी है और कांग्रेस को सरकार चलाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। इस स्थिति में तत्काल विधानसभा फ्लोर टेस्ट कराया जाए। इससे पहले राज्यपाल लालजी टंडन फ्लोर टेस्ट कराने के लिए 14 और 16 मार्च को मुख्यमंत्री को पत्र लिख चुके हैं। कमलनाथ दोनों बार राज्यपाल से मिले और उन्हें बताया कि 16 विधायक बेंगलुरु में बंधक बनाकर रखे गए हैं। ऐसी स्थिति में फ्लोर टेस्ट नहीं कराया जा सकता है। सोमवार को बजट सत्र के पहले दिन बहुमत परीक्षण होना था, लेकिन राज्यपाल के अभिभाषण के बाद स्पीकर ने कोरोनावायरस का हवाला देते हुए विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक स्थगित कर दी थी। सरकार के रवैये से नाराज राज्यपाल अभिभाषण के बाद सिर्फ 12 मिनट में विधानसभा से राजभवन लौट गए थे।

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