आंकड़ों की नजर में बिहार चुनाव 2020: 8 सीटों पर 1000 से कम वोटों का रहा था हार-जीत का अंतर,इस बार बदलेगा नजारा

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साल 2015 का बिहार चुनाव 2010 से अलग था। पुराने साथी उस बार आमने-सामने थे।  एनडीए से अलग हो जेडीयू, कांग्रेस और आरजेडी मिलकर लड़े और जीत हासिल की।  BJP ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 53 सीटों पर कामयाबी हासिल की ।इसबार फिजा बदली हुई है। जहां बीजेपी और जदयू इस बार साथ साथ हैं वहीं महागठबंधन बिखरा हुआ है।

इन सीटों पर 1000 से भी कम वोटों से हुआ था जीत-हार का फैसला

2015 के कुछ मुकाबले बेहद नजदीकी रहे। जीत और हार के बीच का अंतर 1000 वोटों से भी कम था। 243 सीटों में से आठ ऐसी सीटें थीं, जहां मुकाबला बेहद रोचक रहा। वोटों की गिनती जैसे-जैसे बढ़ती जाती थी, राजनीति के खिलाड़ियों के चेहरे का रंग बलता जा रहा था। आइए जानें इन आठ सबसे नजदीकी मुकाबलों के बारे में..

आरा: जीत का अंतर महज 666 वोटों का

भोजपुर जिले के आरा विधानसभा की पिच पर वैसे तो कुल 11 खिलाड़ी उतरे थे, लेकिन मुख्य मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल के मोहम्मद नवाज आलम और बीजेपी के अमरेंद्र प्रताप के बीच सिमट गया था। पांच नवंबर को पवेलियन मैं बैठी जनता ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर इन खिलाड़ियों का भाग्य ईवीएम में कैद कर दिया। 8 नवंबर को जब ईवीएम खुलने लगे तो प्रत्याशी और उनके समर्थकों के चेहरे के रंग बदलने लगे। नवाज आलम और अमरेंद्र प्रताप के बीच मुकाबला इतना कड़ा था कि मतगणना के हर दौर में कभी आलम ऊपर तो कभी अमरेंद्र। अंत में बाजी हाथ लगी राष्ट्रीय जनता दल के मोहम्मद नवाज आलम के हाथ।  आलम को 70004 वोट और अमरेंद्र प्रताप को 69338 वेट मिले। जीत का अंतर महज 666 वोटों का रहा। 

तरारी: सबसे छोटी जीत का रिकॉर्ड भोजपुर की इस सीट के नाम

बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में सबसे छोटी जीत का रिकॉर्ड भोजपुर की तरारी सीट के नाम है। यहां सीपीआई (एम)(एल) के सुदामा प्रसाद ने लोक जनशक्ति पार्टी की उम्मीदवार गीता पांडे को महज 272 वोटों से शिकस्त दी थी। वैसे तो इस विधानसभा सीट की राजनीतिक पिच पर कुल 14 खिलाड़ी बैटिंग करने उतरे थे, लेकिन बाजी मारी सुदामा प्रसाद ने। सुदामा को कुल पड़े वोटों का 28.80% मत मिले, जबकि गीता को 28.60%    वोट। सुदामा 44050 वोट बटोरे तो गीता ने 43,778 वोट। इस कड़े मुकाबले में कांग्रेस प्रत्याशी अखिलेश प्रसाद सिंह ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 40,957 (26.80%) वोटों पर कब्जा जमा लिया।  

बनमनखी: लगातार पांचवीं बार जीती बीजेपी

पूर्णिया जिले की बनमनखी विधानसभा सीट पर 5 नवंबर 2015 को वोट डाले गए थे। इस विधानसभा की पिच पर कुल 18 खिलाड़ियों के भाग्य का फैसला 1 लाख 64 हजार 850 वोटरों ने कर दिया। तीन दिन बाद 8 नवंबर को फैसले की घड़ी भी आ गई। यह सीट 6 बार कांग्रेस जीत चुकी है। कांग्रेस 1985 के बाद से यहां से नहीं जीत पाई है। लगातार चार बार से इस सीट पर काबिज बीजेपी के पास कांग्रेस के रिकॉर्ड की बराबरी करने का मौका था। एक बार पहले भी बीजेपी इस सीट पर जीत हासिल कर चुकी थी। इस बार मुकाबला कांटे का था। बीजेपी के कृष्ण कुमार ऋषि ने लगातार पांचवीं जीत तो हासिल की, लेकिन आरजेडी के संजीव पासवान ने उन्हें आसानी से जीतने नहीं दिया। ऋषि को 59,053 वोट मिले तो पासवान को 58,345 वोट। संजीव पासवान यह मुकाबला केवल 708 वोटों से हर गए।

बरौली: महज 504 वोटों से  हारी बीजेपी

गोपालगंज जिले की बरौली सीट पर भी पिछले चुनाव में कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। इस सीट पर आजेडी के मोहम्मद नेमतुल्लाह ने बाजी मारी थी। उन्होंने बीजेपी के रामप्रवेश राय को महज 504 वोटों से हराया था। बरौली विध्धनसभा सीट पर कुल 17 उम्मीदवारों ने अपना दमखम दिखया था। 59.2 फीसद मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग कया था। नेमतुल्लाह को 40.40% यानी 61,690 वोट मिले थे और राय को 40.10% यानी 61,186।                 

चैनपुर  : बृजकिशोर बिंद को जीतने में पसीने छूटे

कैमुर (भभुआ) जिले की चैनपुर विधान सभा सीट पर भी 2015 का मुकाबला बेहद रोचक था। यहां बीजेपी, बीएसपी और जेडीयू के बीच त्रीकोणीय मुकाबले में बाजी भले ही बीजेपी के हाथ लगी, लेकिन बृजकिशोर बिंद को जीतने में पसीने छूट गए। इस नजदीकी मुकाबले में बीएसपी के मोहम्मद जमा खान ने कड़ी टक्कर दी। तीसरे स्थान पर रहे जेडीयू के महाबली सिंह। चुनाव मैदान में कुल 14 खिलाड़ी थे। कुल 60 फीसद से अधिक वोटरों ने वोटिंग की। बिंद को 33.20% यानी 58913 वोट मिले तो वहीं खान को 32.80% यानी 58,242 वोटों से संतोष करना पड़ा। बिंद केवल 671 वोटों से इस मुकाबले को अपने नाम किया। तीसरे स्थान पर रहने वाले जदयू के महाबली सिंह ने भी अच्छा-खासा वोट बटोरा। उन्हें कुल 30242 वोट मिले।

चनपटिया: बिहार पॉलिटिकल लीग में कांटे का रहा यह मुकाबला

पश्चिम चंपारण जिले की चनपटिया विधान सभा की राजनीतिक पिच पर कुल 10 खिलाड़ियों का भाग्य 5 नवंबर को ईवीएम में बंद हो गया था। कुल 1,52,521 (62.2%) वोटरों ने अपने मत का प्रयोग किया। आठ नवंबर को मतगणना जब शुरू हुई तो मुकाबला कांटे का नजर आया। कभी साथ रही जेडीयू और बीजेपी इस बार अलग-अलग खेले। इस पॉलिटिकल लीग में यह मुकाबला बेहद कांटे का रहा। महज 464 वोटों से हुए इस फैसले में जीत का सेहरा बंधा, बीजेपी के प्रकाश राय के सिर। राय 39 फीसद यानी 61304 वोट पा कर जेडीयू के एनएन शाही के तीर को बेकार कर दिया। शाही को 60,840 यानी कुल पोल्ड वोटों का 38.70% मत मिले। इस मार्जिन से ज्यादा वोट  4,506 (1.8%) नोटा को मिले।

झंझरपुर: आरजेडी ने बीजेपी को महज 834 वोटों से पटखनी द

मधुबनी जिले के झांझरपुर विधान सीट पर 2015 के चुनाव में कुल 18 उम्मीदवार मैदान में थे। एक हजार वोटों से कम मार्जिन पर हुई हार-जीत वाली आठ सीटों में यह भी एक सीट है। यहां आरजेडी के गुलाव यादव ने बीजेपी के नीतिश मिश्रा को महज 834 वोटों से पटखनी दी थी। गुलाब यादव को कुल 64,320 वोट मिले और मिश्रा को 63,486 वोट। यहां पांच नवंबर को 54 फीसद वोट पड़े थे।  

शिवहर: महज 461 वोटों के अंतर से हारीं थी  लवली आनंद

शिवहर सीट पर भी मुकाबला कांटे का रहा। विधानसभा चुनाव 2015 में यह सीट जेडीयू की झोली में गई। महज 461 वोटों के अंतर से HAMS के उम्मीदवार लवली आनंद को शिकस्त मिली। जेडीयू के सैफरुद्दीन को 44,576 वेट मले जबकि नवली आनंद को     44,115 वोट। वहीं निर्दल उम्मीदवार ठाकुर रत्नाकर ने 22,309 वोट हासिल कर लवली का खेल बिगाड़ दिया। इसबार लवली आनंद को आरजेडी का साथ मिला है लेकिन महागठबंधन बिखरा है।

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