बिहार चुनाव 2020: रामविलास पासवान से जनता के भावनात्मक जुड़ाव का फायदा मिलेगा चिराग को

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राम विलास पासवान के निधन का बिहार के चुनाव पर कैसा असर डालेगा – इसका आकलन करना अभी बेहद हड़बड़ी वाली बात होगी. लेकिन उनके व्यक्तित्व के आधार पर कई बातें रेखांकित तो की ही जा सकती हैं.

उनमें राजनीतिक माहौल भांपने की गजब की काबिलियत थी. अपनी इसी काबिलियत के कारण वो सियासी हवा बखूबी पहचान लेते थे. यही वजह थी कि राम विलास पासवान को राजनीतिक मौसम विज्ञानी माना जाता था. केंद्र में सरकार एनडीए की हो या यूपीए की – मंत्रिमंडल में राम विलास की जगह सुरक्षित रहती थी. उन्होंने 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया. लंबे समय तक केंद्र में मंत्री रहे. 1989 में जीत के बाद वह वीपी सिंह की कैबिनेट में पहली बार शामिल किए गए. उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया. एक दशक के भीतर ही वह एचडी देवगौडा और आईके गुजराल की सरकारों में रेल मंत्री बने. 1990 के दशक में जिस ‘जनता दल’ धड़े से पासवान जुड़े थे, उसने भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का साथ दिया. वह संचार मंत्री बनाए गए. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में वह कोयला मंत्री बने. उन्होंने 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की स्थापना की. 2002 में गुजरात दंगे के विरोध में एनडीए से बाहर निकल गए. कांग्रेसनीत यूपीए की ओर गए. दो साल बाद ही सत्ता में यूपीए के आने पर वह मनमोहन सिंह की सरकार में रसायन एवं उर्वरक मंत्री नियुक्त किए गए. नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में खाद्य, जनवितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री के रूप में पासवान ने सरकार का तब भी खुलकर साथ दिया, जब उसे सामाजिक मुद्दों पर आलोचना का सामना करना पड़ा.

राजनीतिक रूप से हवा का रुख भांप कर सबको साधने की क्षमता राम विलास पासवान को विशिष्ट बनाती है. यह विशिष्टता उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में भी बनाए रखी. गौर करें कि उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की कमान अपने बेटे चिराग पासवान को थमाई, पर उनके दोनों भाई हमेशा राम विलास के साथ रहे. कहीं कोई मतभेद नहीं. जरा भी मनभेद नहीं. बिल्कुल समर्पण भाव से दोनों भाइयों का साथ राम विलास पासवान को मिलता रहा. उनकी बीमारी के दिनों में चिराग के लिए ये दोनों भाई अभिवावक की भूमिका निभाते रहे. यानी राम विलास पासवान का कुनबा उनके फैसले में हमेशा उनके साथ खड़ा रहा, इस कुनबे में कहीं भी मुलायम सिंह यादव के कुनबे वाली धमक नहीं दिखाई पडती .
चिराग पासवान ने इसबार जिस तरह से नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोला है, इस फैसले में राम विलास पासवान की सहमति नहीं होगी – यह सोचने की कोई वजह नहीं दिखती. जाहिर तौर पर बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश के विरोध में उतरने जैसे बड़े फैसले में बड़े पासवान की राय शामिल रही होगी और चिराग के चाचाओं का अनुभव भी काम कर रहा होगा. तभी पार्टी ने यह रणनीति बनाई होगी कि नीतीश तुम्हारी खैर नहीं, भाजपा से कोई बैर नहीं. और इसी रणनीति के तहत चिराग ने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और उनकी तस्वीर का इस्तेमाल करेगी.

अब इस नई परिस्थिति में जब राम विलास पासवान का निधन हो चुका है, यकीनन लोजपा को अपने चुनाव प्रचार के लिए किसी और चेहरे की जरूरत नहीं, फिलहाल तो राम विलास पासवान का चेहरा ही उसके लिए सबसे दमदार चेहरा हो चुका है. इस चेहरे की वजह से पार्टी को जनता का भावनात्मक सपोर्ट भी मिलेगा. जो कुछ वोट इस बार छितराने की आशंका थे, उनका ध्रुवीकरण मुमकिन हो गया है. और इतिहास गवाह है कि जब भी चुनाव से पहले किसी कद्दावर नेता का निधन होता है तो उसका भावनात्मक लाभ उसकी पार्टी को चाहे-अनचाहे मिलता ही है.

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