2015 के विधानसभा चुनाव और 2020 में क्या बदल गया और क्या बदलेगा , आंकड़ों की नजर से

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बिहार  में कहने के लिए 2005 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2015 के चुनाव को विकास के नाम पर लड़ा जाने वाला चुनाव बताता जाता रहा है लेकिन हकीकत में हर बार जातीय समीकरण की चुनाव में कुंजी बनते रहे हैं। जहां तक  2005 के विधान सभा चुनाव में राजद के पराजय का सवाल था तो वह इसलिए हुआ क्योंकि राजद के परंपरगत यादव यादव वोट  में सेंध लग गई। 2005 के चुनाव से पहले तक राजद को यादव मतदाताओं का 83% वोट मिलता था जो 2005 में घटकर 60% चल गया। यादवों के इस वोट के खिसकने का सबसे बड़ा करन कानून व्यवस्था का लचर होना था। यह जो वोट पत्रटिशत में कमी आई उसकी कुछ भरपाई 2015 के विधान सभा चुनाव में जरूर हुई जब राजद और जदयू महागठबंधन का हिस्सा बने। 2025 में राजद को यादवों का वोट तो मिल ही साथ में कोइरी , कुर्मी और कुछ महादलित जातियों जैसे भुईयां , निषादका भी समर्थन मिला। राजद और जदयू दोनों को मुसलमानों का भी पूरा साथ मिला और नतीजा भाजपा गठबंधन बुरी तरह परास्त हो गया। 2015  के चुनाव में जहां राजग को ऊंची जातियों के मतदाता अपना समर्थन दे रहे थे, वहीं महागठबंधन को यादव, मुस्लिम और कुर्मी जाति के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त था। आंकड़े देखें तो ऊंची जातियों के करीब 84 प्रतिशत मतदाताओं ने राजग के लिए मतदान किया था। राजग के पक्ष में ऊंची जातियों के मतदाताओं का ध्रुवीकरण जिस प्रकार से हुआ था, वैसा बिहार में हुए पिछले चुनावों में कभी नहीं देखा गया था। अगर हम जातिगत रूप से मतदाताओं को देखें तो करीब 68 प्रतिशत यादव और करीब 71 प्रतिशत कुर्मी मतदाताओं ने महागठबंधन को वोट किया था , जबकि राजग इन कथित जातियों के एक छोटे-से भाग को ही अपने पक्ष में लाने में सफल हो सकी थी।

दरअसल, भाजपा को यह उम्मीद थी कि वह निम्न-वर्गीय अन्य पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में करने में सफल रहेगी। आंकड़े भी इस बात के गवाह हैं कि इन कथित पिछड़ी जातियों के निचले तबके को राजग बड़ी सख्या में अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मसलन, अत्यंत पिछड़ी जातियों के 43 प्रतिशत मतदाताओं ने राजग के लिए मतदान किया था; किन्तु करीब 35 प्रतिशत मतदाताओं ने महागठबंधन के लिए भी मतदान किया था। राजग को यह भी आशा थी कि वह सूबे के दलित मतदाताओं को एक बड़ी संख्या में अपने लिए लामबंद करने में निश्चित रूप से सफल हो सकेगी, क्योंकि उसके साथ बिहार के दो दलित कद्दावर नेता रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी थे। राजग अपने इस मंसूबे में पासवान जाति के मतदाताओं (54 प्रतिशत) को तो आकर्षित करने में सफल हो गई किन्तु, महादलित जातियों के मतदाता बुरी तरीके से महागठबंधन, राजग और अन्य राजनीतिक दलों, विशेषकर बहुजन समाज पार्टी के बीच बंट गये।

2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान जातीय अंकगणित का महागठबंधन के दोनों सहयोगियों- राजद और जद(यू) को फायदा मिला। हालांकि, राजद को जातिगत समीकरणों से अधिक लाभ हुआ । जैसे कि नीतीश कुमार को पारंपरिक रूप से समर्थन करने वाले कुर्मियों ने राजद के प्रति भी वैसी ही प्रतिबद्धता दिखलायी जैसी वे जद(यू) के प्रति दिखलाते रहे थे।आंकडों के अनुसार राजद और जद(यू) के पक्ष में कुर्मी जाति के मतदाताओं की लामबंदी क्रमशः 69 प्रतिशत और 67 प्रतिशत थी, जो कमोबेश सामान ही कही जा सकती है। जबकि, दूसरी ओर जिन सीटों पर जद(यू) चुनाव लड़ रही थी, वहां इसके पक्ष में यादव जाति के मतदाताओं की लामबंदी 60 प्रतिशत से भी कम थी। इस प्रकार आंकड़ों के परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि नीतीश कुमार अपने मूल जनाधार वाले मतों को जितना राजद के लिए हस्तांतरित करने में प्रभावी थे, उतने लालू प्रसाद यादव नहीं हुए थे।

एक और बात , इस विधानसभा चुनाव में ‘महागठबंधन’ को जो स्पष्ट और ‘नाटकीय’ जनादेश मिला था,यह जनादेश समाज को समावेशी बनाने के एजेंडे के कारण ही मिला था।

वास्तव में गौर किया जाए तो एक बात और थी जिसने, बिहार में हो रहे इस चुनाव के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत का यह बयान कि मौजूदा आरक्षण नीति की समीक्षा करने की जरूरत है, ने आरक्षण का लाभ ले रहे दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाताओं के दिमाग में अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी। संभवतः इसके ही प्रभावस्वरूप निम्न-वर्गीय अन्य पिछड़ी जातियां महागठबंधन के पक्ष में एकजुट हो गयीं।

क्या बदल गया है 2020 के चुनाव में:

  1. महादलित और पिछड़ी जातियाँ और उनकी पार्टियां महागठबंधन से दूर हो गईं हैं। मांझी , मुकेश सहनी , उपेन्द्र कुशवाहा जैसे नेताओं के ना रहने से महागठबंधन को इसबार महादलित और अतिपिछड़े  वोटों का नुकसान होगा ।
  2. लोजपा के एनडीए में नही रहने और जदयू के खिलाफ चुनाव लड़ने से जदयू को नुकसान पहुंचना तय है। हालांकि जदयू मांझी और बीजेपी मुकेश सहनी के नाम से इस कमी को पूरा करने की तैयारी में लगें हैं लेकिन लोजपा की कमी खलेगी।
  3. बीजेपी के खिलाफ लोजपा के ना लड़ने से नुकसान जदयू को ज्यादा हो सकता है वहीं लोजपा को उम्मीद है की रामविलास के निधन और बीजेपी के खिलाफ नही लड़ने से उसे सवर्ण वोट के साथ साथ लोगों की सहानभूति का भी फायदा मिलेगा। दरअसल लोजपा यह 2015 के चुनाव में देख चुकी है की अगडी जाती के वोटर बीजेपी गठबंधन को वोट करते हैं और बिना इन वोटों के लोजपा की राह और मुश्किल हो जाएगी। अगर लोजपा को एनडीए के अगडीजति के वोटरों का साथ ना मिला तो राह मुश्किल नहीं असंभव वाली हो जाएगी।

कुल मिलकर देखा जाए तो भाजपा को इस बार फायदा मिलता हुआ जरूर दिख रहा है वहीं जदयू महादलित , अतिपिछड़ा और कुछ मुस्लिम वोट पर भरोसा कर रही है। ऐसे में इसबार राजद , कॉंग्रेस , जदयू और लोजपा के लिए परिस्थिति मुस्किल है मगर बीजेपी को वैसा कोई तनाव नही नजर आ रहा जो 2015 के चुनाव में हो गया था। ऐसे में महादलित वोट अगर एनडीए के पक्ष में पड़ते हैं तो इनकी सरकार बिना किसी मुश्किल के बन सकती है। जबकि कॉंग्रेस इसबार अंदरूनी कलह, सीट बटवारे में गलती, जिन्ना विवाद , सुशांत मौत मामला में उसी तरह उलझ गई है जैसे 2015 में बीजेपी। राजद ने बाहुबलियों का साथ  दे एक झोंकहीं भर कदम उठाया है। विगत तीन चार चुनावों में बाहुबलियों को जिस तरह से जनता ने नकार दिया था अगर वैसा ही इसबार कर दिया तो संकट बढ़ जाएगा।

वैसे यह आकलन आंकड़ों के आधार पर किया गया है असली फैसला तो जनता के हाथ में है और वो क्या फैसला सुनती है ये तो अगले महीने की 10 तारीख को ही पता चल पाएगा।

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