अहमद पटेल: कांग्रेस का वो ‘चाणक्य’ जिसके हाथ में रहता था संगठन का रिमोट

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल का बुधवार सुबह 71 साल की उम्र में निधन हो गया है. अहमद पटेल को राजनीतिक महकमे में कांग्रेस के ‘चाणक्य’ के रूप में माना जाता था. कांग्रेस के तालुका पंचायत अध्यक्ष के पद से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले अहमद पटेल आठ बार सांसद रहे. 1977 में इमरजेंसी के गुस्से को मात देकर 26 साल की उम्र में लोकसभा पहुंचे और फिर सियासत में मुड़कर नहीं देखा. यही नहीं, गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ काम किया और उनके सबसे करीबी बनकर रहे, लेकिन कभी भी मंत्री नहीं बने.

अहमद पटेल देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे. गांधी परिवार के साथ-साथ उन्हें कांग्रेस का ‘संकट मोचक’ नेता माना जाता था. कहा जाता है कि अहमद पटेल की वजह से सोनिया गांधी भारतीय राजनीति में खुद को स्थापित कर पाई हैं. अपने प्रधानमंत्री पति राजीव गांधी की हत्या के बाद इतनी बड़ी पार्टी संभाल पाईं, नरसिम्हा राव जैसे नेताओं से रिश्ते बिगड़ने के बावजूद बनी रहीं. सोनिया के इस सफर के पीछे अहमद पटेल का बड़ा हाथ रहा है. 

बता दें कि गुजरात के भरूच जिले के अंकलेश्वर में 21 अगस्त 1949 को पैदा हुए अहमद पटेल तीन बार लोकसभा सांसद और पांच बार राज्यसभा सांसद रहे. अहमद पटेल के पिता मोहम्मद इशकजी पटेल भरूच की तालुका पंचायत सदस्य थे और कांग्रेस के नेता थे. अहमद पटेल ने अपने पिता की उंगली पकड़कर राजनीति सीखी और कांग्रेस के पंचायत तालुक के अध्यक्ष बने. हालांकि, अहमद पटेल ने अपने बच्चों को राजनीति से दूर रखा है.1976 में उन्होंने मेमूना अहमद से शादी की और उनके दो बच्चे हुए. एक बेटा और बेटी हैं.

26 साल की उम्र में बने थे सांसद

आपतकाल के चलते 1977 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस औंधे मुंह गिरी थी और गुजरात ने उसकी कुछ साख बचाई थी, तो अहमद पटेल उन मुट्ठीभर लोगों में एक थे, जो संसद पहुंचे थे. अहमद पटेल 1977 में 26 साल की उम्र में भरुच से लोकसभा चुनाव जीतकर तब के सबसे युवा सांसद बने थे. उनकी जीत ने इंदिरा गांधी समेत सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था. इसके बाद 1980 और 1984 में इसी भरुच सीट से जीतकर सांसद पहुंचे थे. 1980 में कांग्रेस की वापसी के बाद जब इंदिरा गांधी ने अहमद को कैबिनेट में शामिल करना चाहा, तो उन्होंने संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने विरासत संभाली. राजीव ने 1984 चुनाव के बाद अहमद को मंत्रीपद देना चाहा, लेकिन अहमद ने फिर पार्टी को चुना. राजीव के रहते उन्होंने यूथ कांग्रेस का नेशनल नेटवर्क तैयार किया. इसके अलावा 1977 से 1982 तक पटेल गुजरात की यूथ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. सितंबर 1983 से दिसंबर 1984 तक वो कांग्रेस कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी रहे. 1985 में जनवरी से सितंबर तक वो प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव रहे. उनके अलावा अरुण सिंह और ऑस्कर फर्नांडिस भी राजीव के संसदीय सचिव थे. 

साल 1985 से जनवरी 1986 तक पटेल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहे. कांग्रेस के तालुका पंचायत अध्यक्ष के पद से करियर शुरू करने वाले पटेल जनवरी 1986 में गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष बने, जो वो अक्टूबर 1988 तक रहे. 1991 में जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तो पटेल को कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य बनाया गया, जो वो अब तक बने रहे. 1996 में कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष बने, उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. हालांकि, साल 2000 में सोनिया गांधी के निजी सचिव वी जॉर्ज से उनके रिश्ते बिगड़ गए, जिसके बाद उन्होंने ये पद छोड़ दिया था. इसके बाद वो अगले ही साल सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार बन गए. 

कांग्रेस का चाणक्य कहा जाता था

अहमद पटेल को 10 जनपथ का चाणक्य कहा जाता था. गांधी परिवार के सबसे करीब और कांग्रेस के बेहद ताकतवर असर वाले अहमद लो-प्रोफाइल रहते थे और खुद को साइलेंट मोड पर रखते थे. गांधी परिवार के अलावा किसी को नहीं पता कि उनके दिमाग में क्या रहता था. 2004 से 2014 तक केंद्र की सत्ता में कांग्रेस के रहते हुए अहमद पटेल की राजनीतिक ताकत सभी ने देखी है. 

कांग्रेस संगठन ही नहीं बल्कि सूबे से लेकर केंद्र तक में बनने वाली सरकार में कांग्रेस नेताओं का भविष्य भी अहमट पटेल तय करते थे. यूपीए सरकार में पार्टी की बैठकों में सोनिया जब भी ये कहतीं कि वो सोचकर बताएंगी, तो मान लिया जाता कि वो अहमद पटेल से सलाह लेकर फैसला करेंगी. यहां तक कि यूपीए 1 और 2 के ढेर सारे फैसले पटेल की सहमति के बाद लिए गए. यही नहीं कांग्रेस की कमान भले ही गांधी परिवार के हाथों में रही हो, लेकिन अहमद पटेल के बिना पत्ता भी पार्टी में नहीं हिलता था. यानी रिमोट उन्हीं के पास रहता था.

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