पटना: तेजस्वी को मांझी ने दिया ‘भावुक जवाब’ तो बिहार की सियासत में हुई हलचल! जानें क्या चल रही है चर्चा

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हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी कोरोना संक्रमित हो गए हैं. इस बात की जानकारी दो दिन पहले उन्होंने खुद ट्वीट कर दी थी. 76 साल के मांझी के कोविड से इन्फेक्टेड होने के बाद उनके लिए कई लोग दुआएं कर रहे हैं कि वे जल्द स्वस्थ होकर फिर अपने सामान्य जीवन में लौट आएं. इसी क्रम में अब विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव उनके ठीक होने की कामना की है. इस पर मांझी ने भी अपनी प्रतिक्रिया में तेजस्वी को पुत्र समान बिहार का युवा नेता बना दिया. जाहिर तौर पर इसके सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं.

क्या चाहते हैं मांझी?
सियासी गलियारों की चर्चाओं के अनुसार मांझी संकेतों की भाषा में बात कर रहे हैं जो बिहार की एनडीए सरकार और केंद्र की सियासत में कद और अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की नीति के तहत है. दरअसल इससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने किसानों के हक के लिए आंदोलन करने की बात भी कही थी. फिर पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ने की बात कर भी अपनी इसी महत्वाकांक्षा को जाहिर किया था.

पाला बदलने में माहिर!  
इसके पहले बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन का हिस्सा रहे मांझी ने नीतीश की तारीफ कर नये सियासी समीकरण के संकेत दिए थे. इसके बाद महागठबंधन में सीटों के बंटवारे समेत अन्य मुद्दे पर उन्होंने महागठबंधन छोड़कर जदयू से तालमेल कर एनडीए का हिस्सा बन गए थे. गौरतलब है कि हम नेता जीतन राम मांझी अबतक तीन बार पाला बदल चुके हैं. जेडीयू से एनडीए और फिर महागठबंधन में गए. फिर एक बार एनडीए में शामिल हैं.

जानें सत्ता का गणित
राजनीतिक मामलों को जानकार वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि सियासत में कब क्या हो जाए कोई नहीं कह सकता. कट्टर दुश्मन दिखने वाले दो दल किसी खास मकसद से एक प्लेटफॉर्म पर भी आ सकते हैं इसका ताजा उदाहरण राजस्थान के डूंगरपुर जिला परिषद के जिला प्रमुख पद के चुनाव में तब दिखा था जब कांग्रेस के समर्थन से बीटीपी को हरा भाजपा ने अपना जिला प्रमुख बनाया था. बिहार में नीतीश कुमार की सरकार काफी कम बहुमत के साथ सत्ता में है. ऐसे में आधा दर्जन विधायकों के इधर-उधर होने भर से ही सत्ता का गणित बिगड़ सकता है.

इत्मीनान हैं नीतीश
अशोक शर्मा कहते हैं कि तेजस्वी यादव का मांझी के लिए सम्मान दिखाना और मांझी का तेजस्वी को पत्र समान युवा नेता कहना, बिहार की आने वाली सियासत के लिहाज से काफी अहम है. दरअसल बिहार विधानसभा में दलीय स्थिति पर नजर डालें तो एनडीए के खाते में 125 तो महागठबंधन की 110 सीटें हैं. इनके अलावा अन्य में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम की 5, एक बीएसपी, एक लोजपा व एक निर्दलीय विधायक हैं. इनमें से लोजपा, बसपा व निर्दलीय के विधायकों का समर्थन मोटे तौर पर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के साथ है.

नीतीश की चुनौती
अशोक शर्मा कहते हैं कि बिहार के सियासी गणित को देखें तो एनडीए में मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा व मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी के चार-चार विधायक हैं. ऐसे में अगर इन दोनों का मन किसी कारण से डोल गया तो एनडीए की सरकार खतरे में पड़ जाएगी. वोटिंग की स्थिति में ओवैसी की पार्टी महागठबंधन के साथ हो सकती है. वहीं, सरकार पर खतरे की स्थिति बनी तो बसपा, लोजपा व निर्दलीयों के बारे में भी कुछ ऐसा ही अंदेशा है कि वे भी सरकार बनाने वाले पक्ष के साथ खड़े हो सकते हैं. ऐसे में मांझी के इस बयान के काफी मायने हैं.

क्या सोचते हैं मांझी?
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि जीतन राम मांझी की बातों को सिर्फ सियासी संदर्भ में ही देखना उचित नहीं है. दरअसल मांझी लालू प्रसाद यादव के पहले से प्रशंसक रहे हैं और हाल तक वह महागठबंधन का ही हिस्सा थे. अब जब वह बीमार हैं तो संवेदना व्यक्त करने वालों को जवाब देना तो उनका फर्ज बनता ही है. जाहिर तौर पर पुत्र समान युवा नेता कहना उनके सियासी भाव को भी परिलक्षित करता होगा, परंतु इसमें सियासत ही है, ऐसा बिल्कुल नहीं है.

संभावनाओं का खेल है सियासत
रवि उपाध्याय कहते हैं कि ऐसे भी सीएम नीतीश कुमार इस सूबे की सियासत के सबसे बड़े चाणक्य कहे जाते हैं. अगर मांझी या मुकेश सहनी का मन डोलेगा भी तो नीतीश कुमार इसकी पहले से तैयारी कर चुके होंगे. जाहिर तौर पर वह इसकी काट भी खोज कर रखेंगे और बिहार की सियासत के सिरमौर बने रहने के लिए वे पूरा जोर लगा देंगे. ऐसे भी केंद्र की मोदी सरकार और देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का बैक सपोर्ट उन्हें प्राप्त है तो बिहार की सियासत में इतनी जल्दी उलटफेर की संभावना नहीं है. ऐसे सियासत की संभावनाओं के बारे में कुछ पहले से कहना कहीं से उचित नहीं होगा क्योंकि यह तात्कालिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है.

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