पटना: हाई कोर्ट ने जज को किया सस्पेंड, हत्या के अभियुक्त को जमानत देना पड़ा महंगा

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हत्याकांड के अभियुक्त को जमानत देना बिहार के एक जज को महंगा पड़ गया. विवादस्पद रुप से जमानत देने के इस मामले में पटना हाइकोर्ट ने मोतिहारी के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी यानी कि सीजेएम सुधीर कुमार सिन्हा को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है. अब इस मामले में कोर्ट ने आगे सुनवाई करते हुए ज़मानत लेने वाले अभियुक्त को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है.

न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह की एकलपीठ ने इस मामले पर स्वतः दायर हुई क्रिमिनल रिवीजन मामले की  सुनवाई करते हुए हत्याकांड के अभियुक्त शाहिद रजा की जमानत को रद्द करने के सिलसिले में  नोटिस जारी करने का निर्देश दिया. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से एपीपी अजय मिश्रा ने कोर्ट को बताया कि मोतिहारी के तत्कालीन  सीजेएम ने जमानत आदेश पारित करते हुए गम्भीर गलतियां की है. सीजेएम ने शाहिद को जमानत देने का आधार अन्य अभियुक्तों के संस्वीकृति बयान  (कन्फेशनल स्टेटमेंट ) को बनाया. अभियोजन केस को संदेहास्पद कहा जबकि पुलिस अनुसंधान में इसी अभियुक्त के खिलाफ ठोस सबूत मिले हैं. हत्या की घटना पर उसकी उपस्थिति , गोली मारने वाले अभियुक्त के साथ मोबाइल पर बात कॉल डिटेल रिकार्ड से मिले हैं.

आपको बता दें कि तुरकौलिया थाना कांड  संख्या  725 /2020 मनोज कुमार सिंह नामक शख्स की हत्या के सिलसिले में दर्ज हुआ था. हत्या का कारण  ज़मीन विवाद था, जिसमें अभियुक्त शाहिद को मोतिहारी के तत्कालीन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी सुधीर कुमार सिन्हा ने जमानत पर रिहा होने का आदेश पारित कर दिया था.

इसी मामले में मोतिहारी के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) सुधीर कुमार सिन्हा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है. पटना हाइकोर्ट प्रशासन द्वारा जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक सीजेएम श्री सिन्हा के विरुद्ध यह कार्रवाई बिहार ज्यूडिशियल सर्विस (क्लासिफिकेशन, कंट्रोल और अपील) रूल्स, 2020 के रूल 6 के सब – रूल में दी गयी अधिकारों का प्रयोग करते हुए न्यायालय द्वारा की गयी है.

आदेश में कहा गया है कि इस आदेश के प्रभाव में रहने तक सिन्हा बगैर पूर्व अनुमति के मुख्यालय नहीं छोड़ेंगे. निलंबन की अवधि के दौरान वे बिहार सर्विस कोड के रूल 96 के तहत सब्सस्टिेंस अलाउंस यानी जीवन निर्वाह भत्ता लेने के हकदार होंगे. सीजेएम, मोतिहारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई अभी लंबित है. हाईकोर्ट की कमेटी इस बात की भी अब जांच करेगी कि अभियुक्त को जमानत देना कहां तक न्यायोचित था. 

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