भारत में बदलाव के लिए बजट और उसके बाद के प्रयास का हिस्सा है, सुधार

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‘सुधार’ कोई एक बार होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह शासन की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से हमेशा जारी रहती है। ‘सुधार, प्रदर्शन, परिवर्तन’ के क्रम में अंतिम शब्द- ‘परिवर्तन’ सबसे अहम है, क्योंकि इससे स्पष्ट रूप से लक्ष्य का निर्धारण होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही अपनी सरकार के लिए यह कार्य तय कर दिया था। ‘परिवर्तन’ का लक्ष्य तय था और है- वहीं सुधार और प्रदर्शन इस दिशा में बढ़ने के माध्यम हैं।

आम बजट विशेष लक्ष्यों के निर्धारण और उन्हें हासिल करने के सबसे महत्वपूर्ण साधनों में से एक है। इन विशेष लक्ष्यों में से उन्हें सबसे पहले पूरा किया जाना चाहिए जो जनता के समग्र लाभ से जुड़े हैं। सरकार का वार्षिक बजट 30 लाख करोड़ रुपये का है और व्यय के मद सावधानी से चुने जाने चाहिए, क्योंकि चयन से ही उसकी नीति की दिशा का पता चलता है।

2014-15 के अपने बजट भाषण में, तत्कालीन वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली ने कहा था : “इस एनडीए सरकार के पहले बजट में, जिसे मैं गरिमापूर्ण सदन में पेश कर रहा हूं, मेरा उद्देश्य उस दिशा के लिए समग्र नीतिगत संकेतक तैयार करना है जहां हम देश को ले जाना चाहते हैं।”

हमारे इर्दगिर्द फैले शोर-शराबे में, हम 10 जुलाई, 2014 को जेटली द्वारा प्रस्तुत उनके पहले बजट में और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी, 2021 को पेश किए जाने वाले बजट के बीच मोदी सरकार द्वारा किए गए प्रमुख सुधारों से मिले संदेश को भूल गए होंगे।

बीते साढ़े छह साल के दौरान कई परिवर्तनकारी और जीवन को बदलने वाले सुधार हुए हैं, लेकिन इस दिशा में प्रगति जारी है और आगे भी जारी रहनी चाहिए। कुल मिलाकर,  135 करोड़  भारतीयों की आकांक्षाओं को निरंतर ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के बिना हासिल नहीं किया जा सकता है।

अपने पहले बजट में जब रक्षा विनिर्माण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने के समान ही बीमा क्षेत्र में ऐलान करके, एनडीए सरकार ने सिर्फ सुधारों को ही गति दी है। रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को स्वचालित रूट से 74 प्रतिशत तक और आधुनिक तकनीक तक पहुंच उपलब्ध कराने पर उससे भी ज्यादा सीमा तक के लिए खोल दिया गया है।

चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार विनिवेश की दिशा में आगे बढ़ नहीं पा रही है और कोविड 19 महामारी के चलते भी इसमें देरी हुई है, ऐसे में बीपीसीएल, कॉनकोर और एससीआई जैसे ब्लूचिप पीएसयू की एकमुश्त रणनीतिक बिक्री का फैसला लिया गया है। ऐसी रणनीतिक बिक्री सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान मारुति उद्योग और बाल्को जैसी कंपनियों की हुई थी। मोदी सरकार द्वारा गैर प्रमुख संपदाओं के मौद्रीकरण के लिए दूरगामी सुधारों को स्वीकृति देने का फैसला किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि पीएसयू बैंक,जिनका 12 में विलय कर दिया गया है, भी गैर प्रमुख क्षेत्रों में आते हैं।

 वास्तव में, ऐसे दौर में जब वित्तीय स्थिति दबाव में है, कोविड वैक्सीन टीकाकरण को लागू करने और 29.87 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर भारत पैकेज सहित स्वास्थ्य के लिए जरूरी प्रतिबद्धताओं को देखते हुए बड़े मेट्रो शहरों में रियल एस्टेट परियोजनाओं के साथ ही गैर मुख्य सरकारी संपदाओं की त्वरित बिक्री जरूरी हो गई है।

आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक, तीन किस्तों में घोषित आत्मनिर्भर भारत पैकेज जीडीपी के 15 प्रतिशत के बराबर है और इसमें रोजगार समर्थन, एमएसएमई को आसान वित्तपोषण, खाद्य राहत और संकटग्रस्त क्षेत्रों को सहायता शामिल है। तेज आर्थिक सुधार के रूप में इसका असर दिखना शुरू हो गया है; लेकिन इसके लिए व्यापक वित्तीय प्रतिबद्धताएं की गई थीं और संसाधनों को नए और साहसी कदमों के माध्यम से जुटाया जाना चाहिए। 

बाजार की परिस्थितियां काफी अनुकूल हैं; द्वितीयक बाजार में पीएसयू शेयरों के प्रति पूर्वाग्रह के विपरीत उनके आकर्षक मूल्यांकन पर आशावाद के लिए मार्ग प्रशस्त हो रहा है। अब आगे बढ़ने का समय है। 3 लाख करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य तय करना और प्रचुर नकदी से पूंजी जुटाना संभव हो सकता है।

हमारे वित्तीय बाजारों में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ रहा है, क्योंकि विकासशील बाजारों (ईएम) की सूची में भारत के आंकड़े खासे मजबूत हैं। वित्त वर्ष 22 में वी- आकार के  सुधार की संभावनाओं से उत्साहित सेंसेक्स 50,000 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को छूने की ओर अग्रसर है। ईएम में सबसे ज्यादा पूंजी आकर्षित करने में सक्षम होने के कारण, भारत को कैलेंडर वर्ष 2020 में 23 अरब डॉलर का निवेश हासिल हो चुका है और यह क्रम नए साल में भी जारी है। भारतीय कंपनियों के राजस्व और उनके लाभ की संभावनाओं के मद्देनजर निवेशक उनके ऊंचे मूल्यांकन को लेकर खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं। भारत के उद्योग जगत की सफलता स्टॉक मार्किट के आंकड़ों से जाहिर होती है।

यदि आप उन लोगों में से हैं जो पूंजी बाजार को सट्टा मानते हैं तो आपके लिए एक और आंकड़ा है, जो बताता है कि कैसे वैश्विक निवेशक भारत के साथ आगे चलना चाहते हैं। वित्त वर्ष 2020-21 के शुरुआती छह महीनों में ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड परियोजनाओं में लगभग 30 अरब डॉलर का एफडीआई आया। यदि अनुमान को सीमित रखें तो भी वित्त वर्ष 21 में एफडीआई प्रवाह आसानी से 50 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा। भू-राजनीतिक वजहों और अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडेन के चीन पर नरम नहीं पड़ने की वास्तविकता को देखते हुए, भारत को दुनिया की दिग्गज विनिर्माण कंपनियों के लिए एक  गंभीर विकल्प माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल में भारतीय उद्योग जगत को सलाह दी थी कि हमें सतर्क रहना चाहिए और तेजी से बदले वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य का सामना करने के लिए मुस्तैद रहना चाहिए। पड़ोस में चीन जैसा एक बड़ा विनिर्माण हब होने के कारण यह काम बेहद जरूरी हो जाता है।

वर्तमान कंपनियों पर कंपनी करों की दर घटाकर 22 प्रतिशत और नए निवेश पर घटाकर 15 प्रतिशत करने से भारत दुनिया में सबसे कम कर वाले देशों की सूची में शामिल हो गया है। इसे सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के प्रमुख स्तंभों के रूप में आगे बढ़ाना और प्रचारित करना चाहिए। 

घरेलू परिदृश्य की बात करें तो वस्तु एवं सेवा कर की पेशकश निश्चित रूप से मोदी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण और जीवन को बदलने वाला सुधार है। जीएसटी के कार्यान्वयन में शुरुआत में समस्याएं आई थीं, लेकिन अब उसे हितधारकों से अच्छा समर्थन मिल रहा है। जीएसटी का योगदान अधिकांश भारतीय अर्थव्यवस्था को उपभोक्ताओं और मध्यवर्तियों के साथ औपचारिक कर व्यवस्था के भीतर लाना है, जिसमें व्यवस्था को जीवन के भाग के रूप में स्वीकार किया गया है। अब कर-अदायगी से जीवन ज्यादा आसान होने और इसके कम खर्चीले होने का अहसास ज्यादा व्यापक हो गया है। सरकार ने जीएसटी से रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के सस्ता होने के कई उदाहरण दिए हैं। उदाहरण के लिए, टीवी सेट, वाशिंग मशीन, वाटर हीटर, डिटर्जेंट और कॉस्मेटिक उत्पादों पर कर घटकर 18 प्रतिशत रह गया है, जबकि जीएसटी से पहले की व्यवस्था में यह 28 प्रतिशत था।

वित्तीय समावेशन कार्यक्रम पीएम जनधन योजना को डिजिटल इंडिया पहल के द्वारा ऐसे सुधार में तब्दील किया गया, जो वास्तव में समावेशी है। अगस्त, 2014 से अगस्त, 2019 के बीच 35.27 करोड़ जनधन खाते खोलकर काफी हद तक भारतीय समाज और निचले स्तर के उपभोक्ताओं के जीवन में बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया गया। इनमें से ज्यादातर खाते यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) से जुड़े हुए हैं। पेमेंट वालेट से आगे निकलने की महत्वाकांक्षाओं के साथ बड़ी संख्या में आगे आईं फिनटेक कंपनियों ने तकनीक रूप से सक्षम वित्तीय समावेशन की नींव रखीं, जो संभवतः दुनिया का सबसे बड़ा समावेशन है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अभी तक 161 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के लगभग 2,649 करोड़ वित्तीय लेनदेन हो चुके हैं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पूरी तैयारी से बड़ी छलांग के लिए तैयार हैं, साथ ही एक ‘रचनात्मक बदलाव’ का वास्तविक उदाहरण पेश कर रहे हैं।

‘भर्ती करो और निकालो’ के असमंजस के साथ, बिना किसी शोरशराबे के श्रम सुधारों की शुरुआत की गई है। 29 विभिन्न और पुराने श्रम कानूनों को चार कानूनों में समाहित करने का व्यापक स्वागत किया गया। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने इन श्रम सुधारों को अपनी निवेश नीतियों से जोड़ते हुए लागू करने में खासी तत्परता दिखाई।

आगामी बजट पहले के बजट से काफी अलग होने जा रहा है। निस्संदेह वित्त मंत्री पर संसाधन जुटाने का खासा दबाव है, लेकिन एफआरबीएम की लक्ष्मण रेखा यानी राजकोषीय घाटे को पार करने को लेकर उन पर इस बार नजर नहीं रहेगी। यह नया दौर हो सकता है; ज्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि व्यय को कम नहीं रखा जा सकता है। इसके अलावा यह बजट वैश्विक स्वास्थ्य संकट के बीच में आ रहा है, इसलिए सरकार को पिछले छह साल के सुधारों पर आगे बढ़ना होगा। बदलाव की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।

(लेखक -प्रकाश चावला दिल्ली के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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