चक्रीय-रोधी वित्तीय नीति: अर्थव्यवस्था के लिए बूस्टर डोज -*गुरविंदर कौर और सुरभि जैन

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केंद्रीय बजट 2021-22 ने भारत के मध्यावधि विकास चक्र की नींव तैयार करने का प्रयास किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक निर्णायक मोड़ पर है – यह महामारी और संबद्ध स्वास्थ्य उपायों के दोहरे आघात से लगातार उबरने का प्रयास कर रही है। बजट में उल्लेख किया गया राजकोषीय विस्तार, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘सुरक्षित बच निकलने का संवेग’ प्रदान करेगा, जिससे अर्थव्यवस्था सदी-में-एक-बार के आघात से उबरने में सफल होगी। 

राजकोषीय घाटा लक्ष्य, जो सरकार की उधार आवश्यकताओं को इंगित करता है, वित्त वर्ष 21 बीई (बजट अनुमान) में जीडीपी के 3.5 प्रतिशत से बढकर वित्त वर्ष 21 आरई (संशोधित अनुमान) में जीडीपी का 9.5 प्रतिशत हो गया है। इस वृद्धि के 30 प्रतिशत हिस्से के लिए राजस्व संग्रह में कमी को जिम्मेदार माना गया है, जबकि शेष 70 प्रतिशत हिस्से के लिए पिछले वर्ष के दौरान अधिक सार्वजनिक व्यय को कारण माना गया है। इसी तरह, वित्त वर्ष 2022 बीई के लिए 6.8 प्रतिशत का उच्च राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसलिए, स्पष्ट है कि भारत ने बहुत सोच-विचार करने प्रति-चक्रीय राजकोषीय नीति को अपनाया है – आर्थिक-मंदी के दौरान विस्तार की नीति (और अच्छे समय में संकुचन)।     

आर्थिक समीक्षा 2020-21 ने महामारी के कारण हुए आर्थिक संकट  के दौरान सक्रिय चक्रीय-रोधी वित्तीय नीति को अपनाने के लिए बौद्धिक समर्थन प्रदान किया। आर्थिक मंदी के दौरान उत्पादन में आयी कमी की भरपाई के लिए राजकोषीय विस्तार आवश्यक है, जिसके विभिन्न उपाय हैं – मंदी में उच्च वित्तीय गुणक के माध्यम से निजी निवेश और खपत को बढ़ाना; निजी क्षेत्र को जोखिम से सुरक्षा के लिए क्षतिपूर्ति की व्यवस्था करना तथा जोखिम गुणक के माध्यम से अर्थव्यवस्था में तेजी लाना और प्रत्याशा गुणक के माध्यम से आत्मविश्वास पैदा करना (जैसा बजट घोषणा के बाद इक्विटी सूचकांकों में आयी तेजी से परिलक्षित होता है)। भारतीय रिजर्व बैंक का अध्ययन, देश में राजकोषीय गुणक का अनुमान लगाकर इस तथ्य की पुष्टि करता है – केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय से निजी निवेश को बढ़ावा मिलता है और सरकार के पूंजीगत व्यय में एक रुपये की वृद्धि से उत्पादन में 3.25 रुपये की वृद्धि होती है  (आरबीआई बुलेटिन, अप्रैल 2019)।

वित्त वर्ष 22 के लिए इस विकास केंद्रित बजट की प्रमुख विशेषता, सार्वजनिक निवेश के जरिये खर्च की गुणवत्ता पर जोर देना है। वित्त वर्ष 21 के लिए पूंजीगत व्यय को आरई  में संशोधित  करके 4.39 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है और वित्त वर्ष 22  के लिए 5.54 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। यह वित्त वर्ष 21  के लिए 30.8 प्रतिशत वर्ष-दर-वर्ष की वृद्धि (वित्त वर्ष 20 वास्तविक की तुलना में वित्त वर्ष 21 का संशोधित अनुमान ) और वित्त वर्ष 22 में 34.5 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वित्त वर्ष 21  के बजट अनुमान की तुलना में वित्त वर्ष 22 के लिए बुनियादी ढांचे से सम्बंधित प्रमुख मंत्रालयों के पूंजीगत व्यय आवंटन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, यानी, रेलवे के लिए 53  प्रतिशत, सड़क परिवहन और राजमार्ग के लिए 32 प्रतिशत तथा आवास और शहरी कार्य के लिए 21.8 प्रतिशत की वृद्धि। आर्थिक समीक्षा 2020-21 में विस्तारवादी वित्तीय नीति की बात कही गयी है और इसके लिए सार्वजनिक निवेश में वृद्धि करने, विश्वसनीय तरीके से विकास की उम्मीद को बढ़ाने तथा निजी निवेश में वृद्धि को आवश्यक माना गया है।  इन सभी घटकों को एक-दूसरे से लाभ होगा और इस प्रकार अर्थव्यवस्था पर बेहतर प्रभाव पड़ेगा।

आर्थिक संकट के बीच सार्वजनिक व्यय में विस्तार, अक्सर बढ़ते कर्ज की चिंता को जन्म देता है। आर्थिक समीक्षा 2020-21, वर्तमान परिदृश्य में इन चिंताओं का समाधान पेश करती है। सरकार के ऋण के संचय को ऋण सिद्धांत के एक  साधारण नियम के माध्यम से समझा जा सकता है, जहां ऋण-जीडीपी अनुपात में परिवर्तन, अर्थव्यवस्था की ब्याज-दर और विकास-दर के बीच के अंतर का  समानुपाती होता है। एक ऋणात्मक ब्याज दर-वृद्धि का अर्थ है कि उत्पादन की दर, ऋण पर भुगतान की जाने वाली ब्याज-दर से अधिक है। यह ऋणात्मक अंतर जितना अधिक होगा, ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात उतना ही कम होगा, जिससे सरकार के लिए ऋण स्थिरता सुनिश्चित करना आसान (और तेज) हो जाएगा। यह उधार ली गई धनराशि से किए गए साधारण निवेश के समान है – यदि मूल राशि पर चुकाए गए ब्याज की तुलना में यह अधिक है, तो इसे सँभालने योग्य माना जा सकता है।

आर्थिक समीक्षा 2020-21, व्यापक विश्लेषण के माध्यम से व्याख्या करती है कि  भारत में पिछले ढाई दशकों के दौरान अधिकांश वर्षों के लिए, जीडीपी विकास दर ब्याज दरों की तुलना में अधिक रही है, जिसके परिणामस्वरूप ब्याज दर में ऋणात्मक वृद्धि हुई है और इस प्रकार ऋण का स्तर कम हुआ है। यह दर्शाता है कि निकट भविष्य में भारत में ब्याज दर-वृद्धि अंतर ऋणात्मक रहने की उम्मीद है, चक्रीय-रोधी राजकोषीय नीतियों से ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात निम्न स्तर पर रहेगा और इसके उच्च स्तर पर जाने की सम्भावना नहीं है।

वित्त वर्ष 21 के दौरान उधार (राजकोषीय घाटे) में अपेक्षित तेज वृद्धि के कारण, जैसा केंद्रीय बजट 2021-22 में परिलक्षित हुआ है, केंद्र सरकार के ऋण-जीडीपी अनुपात में वित्त वर्ष 21 मजबूती की उम्मीद है। समीक्षा से पता चलता है कि  उच्च ऋण-जीडीपी अनुपात के रहते हुए भी ऋण स्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय नहीं हो सकती है – यहां तक कि सबसे खराब स्थिति में भी, जहां भारत की वास्तविक विकास दर वित्त वर्ष 2023 से 3.8 प्रतिशत रहे।

केंद्रीय बजट 2021-22 में संकट के दौरान एक अच्छी तरह से तैयार की गई चक्रीय-रोधी राजकोषीय नीति, वर्तमान परिदृश्य में अर्थव्यवस्था के लिए एक बूस्टर डोज के रूप में सामने आयी है। यह आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी और इस प्रकार एक स्व-वित्तपोषण राजकोषीय नीति और सँभालने योग्य ऋण स्तरों के लिए मार्ग प्रशस्त होगा।

लेखिका-द्वय आर्थिक मामलों के विभाग में सेवारत आईईएस अधिकारी हैंव्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।

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