विशेष आलेख: आत्मनिर्भर बनने की राह पर खिलौना उद्योग -*मनोज कुमार सिंह

0
53

वह समय दूर नहीं है, जब हमारे घरों में बच्चे चीनी खिलौने के बजाय देसी खिलौनों से खेलेंगे। अब खिलौना बाजार आयात पर निर्भर नहीं रहेगा । सस्ते चीनी खिलौनों के कारण देश का खिलौना उद्योग सिमटता जा रहा था। लेकिन, केंद्र की मौजूदा सरकार ने खिलौना उद्योगों को विस्तार पाने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। चीनी खिलौने के आयात नियमों को कड़ा किए जाने से भारतीय खिलौना उद्योग में चमक लौट आई है और स्थानीय उद्योगों के कारोबार में सुधार दर्ज हुआ है। आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत खिलौना उद्योग फिर से नये  रूप में खड़ा हो रहा है। खिलौना व्यापारियों ने अब खिलौने बनाने के काम को गति देना शुरू कर दिया है। चीनी खिलौना का मुकाबला करने के लिए कई नये खिलौने बाजार में उतारे गए हैं। बाजार में सुधार को देखते हुए आर्ट एंड क्राफ्ट, ग्रिटिंग कार्ड तथा कई नए खिलौने बाजार में उतारे गये हैं। स्रोतों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक हालिया महीनों में भारतीय खिलौना इकाइयों के कारोबार में 25 से 30 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है। बहुत सी बंद हो चुकी छोटी इकाईयों में अब दोबारा कारोबार शुरू हो गया है।

सरकार ने खिलौना बाजार से चीन की छुट्टी की पूरी तैयारी कर ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं खिलौना मैन्यूफैक्चरिंग के प्रोत्साहन योजना की समीक्षा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री सिर्फ घरेलू बाजार में ही नहीं, दुनिया के बाजार में खिलौनों पर भारतीय छाप देखना चाहते हैं। पीएम ने खिलौना मैन्यूफैक्चरर्स से कहा है कि वे ऐसे खिलौने बनायें, जिसमें ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की झलक हो और उस खिलौने को देख दुनिया वाले भारतीय संस्कृति व पर्यावरण के प्रति भारत की गंभीरता और भारतीय मूल्यों को समझ सकें। पीएम ने घरेलू कारीगरों द्वारा बनाये जाने वाले खिलौनों को प्रोत्साहित करने को कहा है। भारतीय खिलौना कारोबार में आत्मनिर्भर बनने की पूरी गुंजाइश है और इस उद्योग के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ नारे के तहत काम किया जा रहा है।

खिलौना मैन्यूफैक्चरर्स के साथ बैठक में प्रधानमंत्री ने इस उद्योग में संभावनाओं को रेखांकित करते हुए कहा था कि देश में खिलौना निर्माण के कई कलस्टर हैं और सैकड़ों कारीगर स्वदेशी खिलौने का निर्माण कर रहे हैं। घरेलू कारीगर जो खिलौना बनाते हैं, उनमें भारतीयता की झलक होती है, हमारी संस्कृति की झलक होती है। इन कारीगरों को और खिलौना निर्माण के इन कलस्टर को नए आइडिया और सृजनात्मक तरीके से प्रोत्साहित करने की जरूरत है। तकनीक और नए आइडिया वाले खिलौनों के निर्माण के दौरान उत्पाद की गुणवत्ता का भी ख्याल रखना चाहिए जो वैश्विक मानकों को पूरा कर सके। एक मार्केट रिसर्च फर्म के मुताबिक भारत में खिलौना का कारोबार 10,000 करोड़ रुपये का है। इनमें से संगठित खिलौना बाजार 3500-4500 करोड़ रुपए का है। संगठित खिलौना बाजार 85-90 फीसद तक चीन से आयात पर निर्भर करता है। भारत के खिलौना कारोबार में 85 फीसदी हिस्सेदारी आयातित खिलौने की है और इसमें 85-90 फीसदी हिस्सेदारी चीन की है। इसका कारण है, खिलौना बाजार का पूरी तरह आयातक बन जाना। लेकिन, चीन से खिलौने के आयात को हतोत्साहित करने के लिए खिलौना आयात शुल्क में भारी बढ़ोतरी का नतीजा है कि आयातक अब फिर से विनिर्माण शुरू कर रहे हैं। केंद्र की मोदी सरकार की पहल और प्रोत्साहन ने खिलौना मैन्यूफैक्चरर्स को उत्साहित किया है। केंद्र की पहल और प्रधानमंत्री की गहरी रूचि से कई राज्यों की सरकारों ने भी खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने का कदम उठाया है।

कई राज्यों की सरकारें खिलौना व्यवसायियों को खिलौना कलस्टर बनाने की योजना में समर्थन दे रही हैं।  कर्नाटक सरकार ने कोप्पल टॉय कलस्टर की घोषणा कर दी है, जहां अगले पांच साल में 5000 करोड़ रुपए के निवेश की संभावना है। आंध्र प्रदेश के कोंडापल्ली, तमिलनाडु के थंजावुर, असम के धुबड़ी और उत्तर प्रदेश के बनारस में विशेष प्रकार के खिलौनों के निर्माण के लिए कलस्टर बनाने की योजना है। उत्तर प्रदेश सरकार ग्रेटर नोएडा में भी टॉय कलस्टर के विस्तार के लिए जमीन की पेशकश कर रही है। भारत का सालाना खिलौना निर्यात तकरीबन आठ सौ से एक हजार करोड़ रुपये है। जबकि,  भारत सालाना करीब तीन से चार हजार करोड़ रुपये का खिलौना आयात करता है।  देश के खिलौना बाजार का खुदरा कारोबार करीब 15,000-20,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें 75 फीसदी आयातित खिलौने होते हैं और देसी खिलौने सिर्फ 25 फीसदी होते हैं। लेकिन, अब घरेलू खिलौने का कारोबार आने वाले दिनों में बढ़ेगा। केंद्र की मोदी सरकार की पहल और प्रोत्साहन ने खिलौना मैन्यूफैक्चरर्स को उत्साहित किया है। खिलौना मैन्यूफैक्चरर्स न सिर्फ देश के खिलौना बाजार की जरूरतों को पूरा करने को कमर कस लिया है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी निर्यातक बनकर पैठ जमाने की तैयारी में हैं। सरकार इस क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। प्रधानमंत्री के 5 ट्रिलियन-डॉलर की अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण को याद करते हुए और देश में खिलौना बाजार की अपार क्षमता को देखते हुए,  सरकार ने खिलौना उद्योग में भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने का निर्णय लिया है। भारत को वैश्विक खिलौना निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए टॉयकाथॉन का आयोजन किया जा रहा है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तहत शिक्षा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, वस्त्र मंत्रालय, वाणिज्य और  उद्योग मंत्रालय, एमएसएमई मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने संयुक्त रूप से टॉयकाथॉन-2021 को लॉन्च किया है।  इससे भारत को खिलौनों और गेम्स के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित होने में बहुत मदद मिलेगी। टॉयकाथॉन का आयोजन, सरकार द्वारा घरेलू खिलौना उद्योग और स्थानीय निर्माताओं के लिए इकोसिस्टम बनाने का प्रयास है, ताकि संसाधनों और उनकी क्षमता का बेहतर उपयोग हो सके। शिक्षा मंत्रालय के सहयोग से एमएसएमई उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए देश के सभी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्रों तथा संकायों की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होगा। यह पहला मौका है जब स्कूली बच्चे खिलौने बनाने, डिजाइन तैयार करने और अवधारणा को अंतिम रूप देने का कार्य करेंगे। इनमें दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष खिलौनों को भी शामिल किया गया है। वाणिज्य मंत्रालय और एमएसएमई मंत्रालय ने खिलौना निर्माण उद्योग के संरक्षण और इसे प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कई कदम उठाये हैं। भारत के हजारों कारीगर स्वदेशी खिलौनों का निर्माण करते हैं, जो न केवल सांस्कृतिक जुड़ाव रखते हैं, बल्कि कम उम्र में बच्चों के बीच जीवन-कौशल और मनो-कौशल के निर्माण में भी सहायता करते हैं।   

‘वोकल फोर लोकल’ को बढ़ावा देकर इस उद्योग में एक संरचनात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। खिलौना निर्माण में भारत की एक समृद्ध परंपरा रही है। भारत के लिए इन श्रेष्ठताओं का लाभ उठाने और एक फलता-फूलता स्वदेशी खिलौना बाजार विकसित करने के लिए पर्याप्त आधार हैं। इस संभावना का लाभ उठाना, आत्मनिर्भर भारत के क्रियान्वयन की दिशा में एक ठोस कदम साबित होगा। खिलौना निर्माण से जुड़े समूहों और कारीगरों को नवीन और रचनात्मक तरीकों से बढ़ावा देने की केंद्र सरकार की पहल का सकारात्मक परिणाम परिलक्षित हो रहा है। विनिर्माण में गति, देसी इकाईयों के कारोबार में इजाफा से स्पष्ट संकेत  है कि घरेलू खिलौना उद्योग आत्मनिर्भर होने की राह पर चल पड़ा है।

(*लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.