महिला दिवस पर विशेष: अंजु परिहार की दो कविताएँ

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कैसी होती है एक अकेली औरत

कैसी होती है एक अकेली औरत !

अपने लिए सब्ज़ी खरीदती

अपने  लिए खुद  चाय बनाती

टी वी न्यूज़ में अपने लिए कुछ माने ढूंढती

आकाश और धरती से आँखें चुराती

जो उसके लिए हमेशा चुप रहे

उसके कभी न बदले वाले मौसम को घूरते-

कैसी होती है अकेली औरत!

अपने आस पास आते जाते समझदार लोगों के लिए डरने की चीज़ सी

जैसे कोई खाई हो ,पाँव फिसला तो गिर जायेंगे

जैसे वो कोई जहरीला पेड़ हो छू देंगे तो नीले पड़ जायेंगे

कुछ बहादुर समझदार लोग –

उसमें झांकते हैं

ये सोचकर कि शायद इस खाई के अंदर कोई खान छिपी हो या कोईखजाना

नूया इस जहरीले पेड़ को काट दे।

न जाने मैं एक पूरी कहानी हूँ

न जाने मैं एक पूरी कहानी हूँ

या मात्र एक किरदार हूँ ,

मैं औरत हूँ
कहीं व्यापार हूँ, तो कहीं घर-बार हूँ। 
लिखते तो बहुत हो ,पर फिर उसे पढ़ नहीं पाते
पढ़ते हो कभी ,तो फिर खुद को अपने घने अँधेरे की बाहों में हो पाते ,
मैं औरत हूँ-
कभी रौशनी का सरमाया हूँ ,तो
कभी अँधेरे का साया हूँ। 
मेरे साये में ही अपनी साँसे पहचानते हो ,पर
मेरी साँसों के तार काटकर अपनी साँसों का रास्ता खोजते हो-
दार्शनिक हो जाते हो ,मुक्तिमार्गी!
मैं औरत हूँ ,औरत ही रहती हूँ
बस तुम कहते हो –“मैं
तुम्हारे ज़िंदा रहने का वरदान हूँ
मैं
तुम्हारे लिए मौत का अभिशाप हूँ “
न जाने मैं —
एक पूरी कहानी हूँ या मात्र एक किरदार हूँ –

मैं औरत हूँ
कहीं व्यापार हूँ तो कहीं घर बार हूँ। 

अंशु परिहार 

अजमेर {राज }

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