अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पवनसुत सर्वांगीण विकास केंद्र द्वारा महिलाओं को किया गया सम्मानित

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 पवनसुत सर्वांगीण विकास केंद्र के द्वारा परिचर्चा “ वर्तमान परिवेश में महिलाओं की भूमिका “ का आयोजन पटना के आई एम् ए हाँल में आयोजित की गई | कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था की अध्यक्षा श्रीमती सुनीता पाण्डेय ने की एवं संचालन उपाध्यक्ष डॉ पुरुषोतम कुमार ने की |

श्रीमती सुनीता पाण्डेय ने कहाकि स्त्रियों की भ्रूण हत्या से निपटने के लिए मात्र सरकारी प्रयास काफी नहीं है। घरों में मानसिकता बदलने की जरूरत है। कई स्थान पर भ्रूणहत्या के कारण जेन्डर इम्बैलेंस शुरू हो चुका है। यह तो सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अधिक कठिन स्थिति है। यदि स्त्री स्वयं मजबूत हो जायगी तक सब ठीक हो सकता है। स्त्री अब ‘‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानीआँचल में है दूध और आँखों में पानी’’ की स्थिति से कब का उबर चुकी है। स्त्री मन से जीत गई है। इस महिला दिवस पर जो जमात दिख रही है वह सभी शक्तिमती हैधैर्यवान है। आत्माभिमान से लैस हैकर्मठ है। आत्मग्लानि के भाव को झटककर दूर कर चुकी है।

डॉ पुरुषोतम कुमार ने कहाकि मजदूर वर्ग की स्त्रियों का वेतन मजदूरी पुरूष मजदूर से आधा होता। हजारों साल यह क्रम चला। परन्तु इतिहास इतना भी खामोश नहीं होता कि सदा के लिये मनुष्य चेतनाशून्य हो जाय। स्त्री भी मनुष्य है। यह भान होते ही वह तनकर खड़ी हो गई। संघर्ष शुरू हो गया। बलिदारी स्त्रियों के कारण जीत हुई। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस उसी जीत का जश्न का दिन है। स्त्रियों को पंख मिलेअधिकर मिले। तभी आज हम सशक्त हैं। खेत में धान रोपने से लेकर हम रेलगाड़ीबसें और हवाई जहाज उड़ाती हैं। हम स्त्रियाँ फिटरजम्बर हैंऑटोरिक्शा चलाती हैं और अंतरिक्ष तक जाती हैं। अब स्त्री सशक्त है। आंतरिक सुरक्षा का भार उठाने को पुलिस में हैं तो सीमा की सुरक्षा के लिए सेना में हैं।

कार्यक्रम में संवोधित करते हुए संस्था के सचिव डॉ राकेश दत्त मिश्र ने कहाकि ‘‘माता पृथ्वी पुत्रोंऽ हम’’-कहते हैं। अर्थात् जिस धरती पर जन्म लिया वह माता स्त्री ही है। स्त्री की महिमा वेद पुराणलोक तथा समाज सदा बखानते रहे हैं। क्यों न बखानेजन्म देती हैपोषण करती है। महिला दिवस पर महिलाओ को बधाई तब तक नहीं चाहिए जबतक उनकी स्थिति पूरी तरह न सुधरे। नारी की गरिमा का गीत गाते गाते हम उसकी वास्तविक स्थिति को भूल जाते हैं। ट्रक चलाने वाले स्त्री के हाथ जबर्दस्ती करने वाले पुरूष से क्यों हार जाते हैंहमें यदि एक नया संसार बना डालना है तब इस अहम विषय पर विचार करना होगा। महिला दिवस पर सबसे पहले यह संकल्प लेना होगा कि पूरे समाज को कैसे जागरूक करें। अक्सर स्त्रियों को नहीं पता होता कि वे स्वयं अपनी बेटियों को दोयम दर्जा का होने का भान कराती हैं। बेटे को ऊपर समझती हैं। पढ़ी लिखी समझदार स्त्रियाँ भी इसी कंडिशनिंग से गुजरती हैं। प्रकृति ने स्त्री की संरचना माँ बनने के लिए की है यह सौभाग्य प्रायः दुर्भाग्य बनकर उभर आता है। समाज की स्त्रियाँ अगर चाहें तो इस स्थिति से स्त्रियों को स्वयं ही उबार लें। अपने घर के पुरूषों को सुधारने की दिशा में एकजुट हो जायें। घर के बलात्कारी को प्रश्रय न देंसंरक्षण न दें उन्हें सबक सिखायें। पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार करें। यह फाँसी की सजा से भी अधिक कारगर उपाय होगा।

        इस अवसर पर साहित्य के क्षेत्र में कार्यकरनेवाली शकुन्तला मिश्र,  शिक्षिका संध्या कुमारी  महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में कार्य करनेवाली सुनीता गिरी, बेबी देवी, पार्वती कुमारी, सलोनी मिश्र, बिंदी देवी, अनीता सिन्हा, कृत्या कुमारी को सम्मानित किया गया |

इस अवसर पर मुकेश कुमार,रवि कुमार, रविन्द्र सिंह, शशांक भूषण, अशोक कुमार, चन्द्रकांत मिश्र, संजय कुमार चौधरी,मंसूर आलम, गोलू कुमार, राजीव कुमार “चुन्नू” आदि उपस्थित थें|

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