जानिए कुशवाहा और नीतीश के बीच डील की पूरी स्टोरी, कुशवाहा के साथ आने से क्या होगा जदयू को फायदा ?

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कुछ महीने पहले हुए बिहार के विधानसभा चुनाव में लगभग 95 फीसदी सीटों पर जमानत गंवाने वाले उपेंद्र कुशवाहा और उनकी पार्टी का जेडीयू में विलय करा कर नीतीश कुमार आखिर क्या हासिल कर पायेंगे. सियासी हलके में इसी सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है. आखिरकार नीतीश किसे मैसेज देना चाहते हैं. आरजेडी को या अपनी सहयोगी पार्टी बीजेपी को. सवाल ये भी पूछा जा रहा है. लेकिन इन सवालों से अलग कोई बात तय है तो वो ये कि उपेंद्र कुशवाहा मोटी डील करके ही जेडीयू में शामिल हुए हैं.

दूध के जले कुशवाहा ने छाछ भी फूंक कर पी है
दरअसल उपेंद्र कुशवाहा बिहार की सियासत में उन गिने चुने लोगों में से हैं जो नीतीश कुमार को जानते हैं. नीतीश की बातों में उन्होंने इससे पहले भी मुंह जलाया था. 2005 में जब बिहार में जेडीयू सत्ता में आयी तो कुशवाहा किस कदर किनारे कर दिये गये थे. ये उन्हें याद है. नीतीश कुमार ने राजद से बुलाकर शिवानंद तिवारी को राज्यसभा भेज दिया था. उपेंद्र कुशवाहा मुंह ही देखते रह गये थे.

सियासी जानकार उस नजारे को भी याद करते हैं जब पटना के एक सरकारी बंगले से उपेंद्र कुशवाहा का सामान सड़क पर फिकवा दिया गया था. सरकारी बंगले में उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी अकेले मौजूद थीं. लेकिन अकेली महिला का भी ख्याल नहीं रख के नीतीश सरकार के राज में ही उनका सामान बाहर निकाल कर बंगले पर सरकारी ताला मार दिया गया था.

जेडीयू से तब बाहर हुए उपेंद्र कुशवाहा ने राष्ट्रीय समता पार्टी बनायी थी. वे अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड रहे थे. तभी 2009 का लोकसभा चुनाव आया. उपेंद्र कुशवाहा के जेडीयू छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने नागमणि को अपनी सरकार और पार्टी में कुशवाहा जाति के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में नागमणि को टिकट नहीं मिला. वे पार्टी औऱ सरकार दोनों छोड़ कर चले गये.

2009 में नागमणि के जेडीयू छोड़ने के बाद नीतीश कुमार को फिर फिक्र हुई कि पार्टी में कुशवाहा चेहरा कौन होगा. तब फिर उपेंद्र कुशवाहा की याद आयी. उपेंद्र कुशवाहा पटना के विधायक क्लब में अपनी राष्ट्रीय समता पार्टी की बैठक कर रहे थे. नीतीश कुमार उनकी बैठक में पहुंच गये थे. वहां से कुशवाहा जेडीयू दफ्तर आये और फिर से नीतीश के सेनापति बन गये. इनाम में उन्हें 2010 में राज्यसभा भेज दिया गया.

वादा भूल गये थे नीतीश
सियासी जानकार बताते हैं कि 2009 में उपेंद्र कुशवाहा को जेडीयू में लाने के समय जो वादे नीतीश कुमार ने किये थे उन्हें भूलने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया. उपेंद्र कुशवाहा खुद कई मौकों पर बता चुके है कि उन्हें इस शर्त पर पार्टी में लाया गया था कि उनके समर्थकों को चुनावी टिकट देने के साथ साथ बोर्ड-निगम में भी एडजस्ट किया जायेगा. लेकिन जब 2010 का चुनाव आया तो टिकट के बंटवारे में उपेंद्र कुशवाहा के किसी समर्थक की कोई चर्चा तक नहीं की गयी.  नाराज उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. राजगीर में जेडीयू के प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुला मोर्चा खोला.

उन्होंने मंच से एलान किया कि जेडीयू में अगर कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं हुआ तो पहली गाड़ी पकड़ कर दिल्ली जायेंगे और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे. हालांकि उपेंद्र कुशवाहा इस्तीफा देने नहीं गये. लेकिन नीतीश कुमार ने उनकी सदस्यता रद्द कराने के लिए राज्यसभा में आवेदन दे दिया. वैसे उपेंद्र कुशवाहा ने 2013 में पार्टी के व्हीप के खिलाफ वोटिंग की. उन्होंने न्यूक्लियर डील मामले में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के पक्ष में वोटिंग की. व्हीप उल्लंघन के बाद सदस्यता जानी तय थी. लिहाजा उपेंद्र कुशवाहा ने राज्यसभा से इस्तीफा कर दिया.

उसके बाद ही उन्होंने अरूण कुमार के साथ मिलकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनायी. नीतीश विरोध के कारण ही उन्हें बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में जगह मिली और 2014 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने तीन लोकसभा सीटों पर जीत भी हासिल कर ली. उपेंद्र कुशवाहा केंद्र में मंत्री भी बन गये. लेकिन 2017 में नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ आ गये. उसके बाद ही एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा के बुरे दिन शुरू हो गये. हाल ये हुआ कि 2019 के चुनाव में जब सीटों का बंटवारा हो रहा था तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को एक सीट देने का ऑफर दिया गया.

नीतीश मुझे ठिकाना लगाना चाहते हैं
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही उपेंद्र कुशवाहा खुद कह रहे थे कि नीतीश कुमार उन्हें ठिकाना लगाना चाहते हैं. नीतीश ने ही बीजेपी को बाध्य कर दिया है कि उपेंद्र कुशवाहा को एक से ज्यादा सीट नहीं दी जाये. मजबूरन उपेंद्र कुशवाहा आरजेडी के पाले में गये. लोकसभा चुनाव में उन्हें महागठबंधन में पांच सीटें मिली. हालांकि सारी सीटों पर उनकी पार्टी चुनाव हार गयी. उस हार का असर ये हुआ कि 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने उनका कोई नोटिस ही नहीं लिया. मजबूरन उपेंद्र कुशवाहा को बसपा औऱ ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ गठबंधन करना पड़ा. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 99 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमें 94 पर जमानत जब्त हो गयी. जीतने की बात तो दूर रही, किसी भी सीट पर उनका प्रत्याशी दूसरे स्थान पर भी नहीं रहा.

फिर क्यों हुई नीतीश को कुशवाहा की तलब
दरअसल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर विश्लेषण करने वाले लोग चिराग पासवान की पार्टी को नीतीश की हार का बड़ा कारण बताते हैं लेकिन वे उपेंद्र कुशवाहा को भूल जाते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में 19 सीटें ऐसी रहीं जहां उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी या गठबंधन को जितना वोट मिला उससे कम वोट से नीतीश कुमार की पार्टी चुनाव हारी. नीतीश और उनके सलाहकार ये मान रहे हैं कि कुशवाहा के गठबंधन ने जितने वोट काटे वे ज्यादातर कुशवाहा वोट थे. अगर कुशवाहा वोटों का बंटवारा नहीं होता तो जेडीयू 19 सीटें औऱ जीत सकती थी.

दरअसल बिहार की सत्ता पर नीतीश जिस आधार वोट के सहारे काबिज हुए उसे लव-कुश समीकरण माना जाता है. लव यानि कुर्मी औऱ कुश मतलब कुशवाहा. 2020 का विधानसभा चुनाव का परिणाम ये बता रहा था कि नीतीश का लव-कुश समीकरण दरक गया है. कुश अलग राह देख रहा है. दिलचस्प बात ये है कि इस समीकरण में ज्यादातर वोट कुश यानि कुशवाहा का ही है. अगर कुशवाहा अलग हो जाये तो फिर नीतीश का क्या हाल होने वाला है ये वो खुद समझ रहे थे. लिहाजा पहले उन्होंने उमेश कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर मैसेज देने की कोशिश की. फिर ताबड़तोड़ कोशिशें जारी रखी कि उपेंद्र कुशवाहा उनके पाले में आ जायें.

क्या है डील
वैसे सियासी हलके में सबसे ज्यादा ये सवाल पूछा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा औऱ नीतीश कुमार के बीच डील क्या हुई है. जानकार सूत्र बता रहे हैं कि पहले ही नीतीश से धोखा खा चुके उपेंद्र कुशवाहा सारी बात फाइनल करके गये हैं. वो भी मध्यस्थों के सामने. जो बात हुई है उसमें गवाह को भी रखा गया है ताकि नीतीश अगर बाद में मुकरे तो मध्यस्थ वशिष्ठ नारायण सिंह को गवाह के तौर पर पेश किया जा सके.

जेडीयू के एक वरीय नेता के मुताबिक डील में उपेंद्र कुशवाहा ने बड़ी मांगें स्वीकार करायी है. पहली मांग है विधान परिषद की दो सीटें. राज्यपाल कोटे से मनोनयन में एक सीट फिर अगले साल होने वाले चुनाव में एक सीट. उपेंद्र कुशवाहा अपनी पत्नी के साथ साथ अपने एक समर्थक को भी विधान परिषद भेजना चाहते हैं. उनकी दूसरी डील मंत्री पद को लेकर हुई है. उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी को मंत्री बनाया जा सकता है. तीसरी डील राज्यसभा सीट को लेकर होने की खबर है. सूत्रों के मुताबिक उपेंद्र कुशवाहा अगले साल राज्यसभा भेजे जायेंगे.

वैसे उपेंद्र कुशवाहा को आज जेडीयू संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है. लेकिन कुशवाहा खुद समझ रहे होंगे कि ये झुनझुना है. जिस पार्टी में हर बात खुद नीतीश कुमार तय कर रहे हों वहां संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष क्या कर लेगा. उपेंद्र कुशवाहा ने अपने लिए राज्यसभा सीट के अलावा समर्थकों के बोर्ड-निगम में एडजस्टमेंट की भी मांग रखी है. इसका भरोसा दिलाया गया है. लेकिन ये फिक्स नहीं हुआ है कि कुशवाहा के कितने समर्थक बोर्ड-निगम में एडजस्ट होंगे.

वैसे ये देखना भी दिलचस्प होगा कि उपेंद्र कुशवाहा से किया गया वादा किस हद तक पूरा होता है. पुराना इतिहास तो कुछ अलग ही कहानी कह रहा है. लेकिन शायद उपेंद्र कुशवाहा के सामने भी कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है. वे खुद अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. लिहाजा नीतीश की बातों पर यकीन करना ही उन्हें बेहतर लगा.

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