विशेष आलेख: विश्व भर में बसे भारतवंशियों का तीर्थ है भारत-*आर. के. सिन्हा

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पूर्वी अफ्रीकी देश केन्या में कुछ समय पहले अवतार सिंह सेहमी नाम के एक भारतवंशी सज्जन का निधन हो गया। वे करीब 90 साल के थे। लेकिन, उनकी एक हसरत पूरी नहीं हुई। इस कारण केन्या में बसे भारतीय मूल के काफी लोग उदास हैं। सेहमी चाहकर भी कभी अपने पुरखों के वतन भारत नहीं जा सके। उनके माता-पिता 1890 के आस-पास पंजाब से मुंबई होते हुए केन्या गए थे। ब्रिटिश सरकार जबरन पंजाब से हजारों लोगों को केन्या में रेल नेटवर्क को बिछाने के लिए लेकर गई थी। उनमें सेहमी के माता-पिता भी थे।

दरअसल इस त्रासदी से लाखों भारतवंशी हर साल गुजरते ही रहते हैं। वे कभी अपने पुरखों के देश के या अपने पुरखों की जन्म भूमि के दर्शन कर नहीं पाते हैं। सेहमी समाज सेवी और भारतीय मूल के लोगों के बीच में काफी सक्रिय और लोकप्रिय थे। पर वे एक अधूरी हसरत को लेकर संसार से विदा हो गए। जो आर्थिक रूप से सम्पन्न भारतवंशी होते हैं वे तो कभी न कभी भारत आ ही जाते हैं। यहां पर आकर वे कुछ बड़े महानगरों के अलावा अपने गांव, शहर, हरिद्वार, ऋषिकेश,बद्रीनाथ, केदारनाथ, बनारस, अमृतसर वगैरह जाना चाहते हैं और चले भी जाते हैं। इस तरह से उनकी अपने भारत में जाने की इच्छा पूरी हो जाती है। पर दुर्भाग्यवश यह सुख सबको तो नसीब नहीं होता। देखिए कि भारतवंशी सात समंदर पार बसकर भी भारतीय ही कहलाते हैं। उनके साथ ही रहते हैं उनके भारतीय संस्कार, मूल्य, मर्यादाएं और नैतिकताएं।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, इस समय सारी दुनिया में ढाई करोड़ से अधिक भारतवंशी दुनिया के चप्पे –चप्पे में हैं। यह एक बड़ी संख्या है जो पचासों छोटे देशों से अधिक है I ये कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी बने हैं या अभी भी है। ये दर्जनों देशों की संसद में भी हैं। मतलब ये जिधर गए और बसे, वहां पर ये रचनात्मक रूप से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं। यह उन देशों के सबसे खासमखास पदों पर पहुंच गए। पर यह तस्वीर का एक पहलू ही है। ये सब जगह धनी नहीं है। हालांकि मीडिया तो सिर्फ सफल कहानियों को ही पेश करता है। तो जो धनी नहीं है उनके लिए जीवन में कम से कम एक बार भारत जाना भी संभव नहीं हो पाता है। ये जीवनभर ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहते हैं कि इन्हें कम से एक बार तो भारत देखने का सुख मिल जाए। नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वी.एस.नायपाल 1960 के दशक में पहली बार भारत आए थे। वे लंदन से मुंबई पहुंचे। संयोग से वह दिवाली की रात थी। वे सारे वातावरण को देखकर इतने अभिभूत हुए कि वे उस रात-रात का बार उल्लेख किया करते थे। उसके बाद तो वे बार-बार भारत आते रहे। उन्होंने भारत की कई स्तरों पर निंदा भी की, पर वे भारत के प्रति अगाध प्रेम का भाव भी रखते थे। अगर आप खेल प्रेमी हैं तो आपने देखा होगा कि लंदन से लेकर डरबन और मेलबर्न से लेकर कुआलालम्पुर के मर्डेका स्टेडियम तक में भारतवंशी भारतीय टीमों को सपोर्ट कर रहे होते हैं। वे उस देश की टीम को सामान्यतः सपोर्ट नहीं करते जिधर वे या उनके परिवार लंबे समय से बसे हुए हैं। हां, जब उस देश का मैच भारत से हटकर किसी अन्य से होता है तो वे अपने निश्चय ही अपने वर्तमान देश के साथ होते हैं।

सच बात यह है कि भारतवंशियों के लिए भारत एक भौगोलिक वास्तविकता मात्र नहीं है। ये समझना होगा। अगर बात सिखों की करें तो भारत उनके लिए तो गुरुघर है। यही स्थिति बौद्धों और जैन धर्मावलम्बियों के साथ भी है I इसलिए इसके प्रति उनकी अलग तरह की निष्ठा रहती ही है। भारत सिखों के लिए एक पवित्र भूमि है। शेष भारतवंशियों के संबंध में भी कमोबेश यही कहा जा सकता है। इसलिए ये अफ्रीका, कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन वगैरह में बसने के बाद भी अपने को भारत से दूर नहीं कर पाते। इसका उदाहरण हमें मलेशिया, मारीशस, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका वगैरह में देखने को मिलता है।

भारतवंशी अपने खानपान तथा वेशभूषा के स्तर पर भी सदा भारतीय ही बने रहते हैं। दिवाली और होली, शादी समारोह और सभी पर्व त्योहारों पर भारतीय महिलाएं आमतौर पर साड़ी ही पहनती हैं। इनके घरों में ज्यादातर भारतीय व्यंजन ही पकते हैं। लेकिन ये जिधर जाकर बसे वहां की भाषा, खानपान और वेशभूषा को भी आसानी से अपना लेते हैं। मारीशस के भारतवंशी अगर धाराप्रवाह फ्रेंच भाषा बोलते है तो ईस्ट अफ्रीका के भारतीय स्वेहली में पारंगत होते हैं। लेकिन, वे अपने पुरखों की भाषा भोजपुरी और उसके लोकगीतों को कभी छोड़ते नहीं I

देखिए विदेशों में बसे भारतीयों को दो भागों में बांटना होगा। पहला, भारतवंशी, यानि वे, जिनके पुरखे 1834 से 1884 के बीच अंग्रेजों द्वारा मजदूरी के लिये विश्व भर में गन्ने की खेती, सड़कों और रेलमार्ग निर्माण के लिये जबरन या धोखे से ले जाये गये थे। इनसे हमारा सांस्कृतिक और भावनत्मक संबंध अटूट है। दूसरा, प्रवासी भारतीय, जो नौकरी के लिए देश से बाहर गए हुए हैं। इन्हें अंग्रेजी में नॉन रेजिडेंट इंडियन (एनआरआई) भी कहते हैं। ये दोनों भारत के बाहर अपने देश के ब्रांड एंबेसेडर हैं। अगर भारतवंशी भारत को पवित्र तीर्थ स्थल मानते हैं तो प्रवासी भारतीय अपनी मातृभूमि पर दोनों हाथों से अपनी मेहनत से कमाये गये धन की वर्षा करते हैं। भारत को मोटी रकम मिल रही है मुख्य रूप से खाड़ी के देशों में बसे लाखों भारतीयों से। इनमें शामिल हैं बहरीन, कुवैत, ओमन, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ।

इन सभी देशों में मेहनत, मशक्कत करने वाले भारतीय छोटी-मोटी नौकरियों को करने से लेकर अब अपनी मेहनत से बड़े कारोबारी भी हो गए हैं। आप कभी दुबई या बहरीन एयरपोर्ट में खड़े हो जाइये। आपको लगेगा कि आप भारत में ही हैं। ये ही भारतीय स्वदेश जमकर रकम भी भेजते हैं। लेकिन, इन्हें इस बात का पर्याप्त क्रेडिट नहीं मिल पाता है। निश्चित रूप से इन भारतीयों से मिलने वाली रकम का सरकार गरीबी उन्मूलन और बाकी विकास योजनाओं के लिए ही तो इस्तेमाल करती है। इनसे प्राप्त हो रही रकम से देश की विदेशी मुद्रा का भंडार भी सदैव लबालब भरा ही रहता है। खाड़ी वाले प्रवासी भारतीय तो साल-दो साल में भारत आते-जाते भी रहते हैं। इनके परिवार यहां ही हैं। पर जरा सोचिए अफ़्रीकी और कैरेबियन देशों में रहने वाले भारतवंश्यों के बारे में। वे दूसरी, तीसरी या चौथी पीढ़ी के भारतवंशी होने पर भी भारत से मोह नहीं छोड़ पाते। उनकी रक्त धाराओं में भारत ही बसता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 6 वर्षों में जहां पर भी गए वे भारतवंशियों से जरूर मिले। भारतवंशियों ने भी उनका अमेरिका, आस्ट्रेलिया,फीजी आदि देशों में गर्मजोशी से स्वागत किया। भारत सरकार सारी दुनिया में बसे भारतवंशियों के हितों को लेकर पहले से अधिक संवेदनशील हो चुकी है। अगर वह गरीब भारतवंशियों को अपने देश की यात्रा करवाने का कोई सस्ता विकल्प लेकर आ जाए तो वह भारतवंशियों पर बड़ा उपकार ही करेगी।

(*लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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