फेम्टो लेजर से मोतियाबिंद का ऑपरेशन बिहार में अभी भी नहीं होता इसलिए जाना पड़ा नीतीश को दिल्ली,2022 के बाद नहीं जाना होगा बाहर

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक आंख में मोतियाबिंद का ऑपरेशन गुरुवार को हो गया। दूसरी आंख का ऑपरेशन दो-तीन दिन बाद होगा। शुक्रवार को उनकी आंख की जांच की गई और ऑपरेशन सफल पाया गया। विपक्ष इस पर सवाल उठा रहा है कि नीतीश कुमार 16 साल में भी बिहार में उन्नत तकनीक के मोतियाबिंद ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाए। खुद मुख्यमंत्री को ऑपरेशन के लिए दिल्ली एम्स जाना पड़ा।

फेम्टो लेजर के साथ फेको विधि से हुआ ऑपरेशन

भास्कर ने इसकी जानकारी जुटाई कि आखिर क्यों मुख्यमंत्री को मोतियाबंद के ऑपरेशन के लिए दिल्ली जाना पड़ा। पता चला कि दिल्ली एम्स में फेम्टो लेजर के साथ फेको विधि से उनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया गया है। इस तकनीक का फायदा यह है कि एक आंख के ऑपरेशन के बाद दूसरी आंख का ऑपरेशन दो-तीन दिन बाद कराया जा सकता है। पहले यह होता था कि एक ऑपरेशन के कई सप्ताह के बाद ही दूसरी आंख के मोतियाबिंद का ऑपरेशन किया जाता था।

राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की आंख का ऑपरेशन कर चुके हैं डॉ. टटियाल

दिल्ली एम्स में डॉ. जेएस टिटियाल ने मुख्यमंत्री की आंख का ऑपरेशन किया है। टिटियाल का नाम आंखों की सर्जरी में काफी ऊंचा है। प्रणव मुखर्जी, मनमोहन सिंह सरीखे नेताओं की आंखों का ऑपरेशन इन्होंने ही किया है। फेम्टो लेजर मशीन 4 करोड़ रुपए में आती है, लेकिन सिर्फ मशीन लगा लेने से सफल ऑपरेशन नहीं हो जाता। उसके लिए स्किल्ड सर्जन की भी जरूरत पड़ती है। टिटियाल का हाथ इस मामले में गजब का माना जाता है।

IGIMS में 187 करोड़ रुपए से बन रहा आंखों का एडवांस अस्पताल

भास्कर ने पता किया कि बिहार में सेम्टो लेजर तकनीक की सुविधा है कि नहीं? पता चला कि पटना के इंदिरा गांधी आर्युविज्ञान संस्थान (IGIMS) में भी इसकी सुविधा नहीं है। सगुना मोड़ के पास एक प्राइवेट अस्पताल में है। भास्कर ने IGIMS के आई डिपार्टमेंट के हेड डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा से बात की। उन्होंने बताया कि नए आई हॉस्पिटल में इसकी सुविधा होगी। लेकिन इसमें अभी देर है। 187 करोड़ रुपए से साढ़े चार एकड़ में यह अस्पताल बन रहा है। पहले से जो है, वह भी बिहार का उन्नत अस्पताल है। लेकिन यहां बन रहा आंख का नया अस्पताल पूर्वी भारत का सबसे बड़ा सरकारी आई हॉस्पिटल होगा।

उन्होंने कहा कि सितंबर 2022 तक नए अस्पताल के भवन के निर्माण का लक्ष्य है। इसके लिए केन्द्र सरकार 60 फीसदी और राज्य सरकार 40 फीसदी राशि दे रही है। 2022 के बाद यह तकनीक बिहार के सरकारी अस्पताल में मोतियाबिंद के मरीजों को उपलब्ध हो जाने की उम्मीद है।

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